श्री राम लीला समिति बक्सर के तत्वावधान में नगर के रामलीला मंच पर चल रहे 21 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के क्रम में वृंदावन से पधारे श्री नंद नंदन रासलीला एवं रामलीला मंडल के स्वामी श्री करतार बृजवासी के निर्देशन में नवें दिन रविवार को दिन में मंचित कृष्णलीला कार्यक्रम के अन्तर्गत “सुदामा चरित्र” के प्रसंग का मंचन किया गया. जिसमें दिखाया गया कि सुदामा जी एक गरीब ब्राम्हण और उनके बचपन के सखा श्री कृष्ण द्वारिकापुरी के राजा होते हैं.
अपनी पत्नी के बार बार कहने के बाद एक दिन सुदामा जी अपने दीनता भरे जीवन में मदद के लिए अपने बचपन के मित्र श्री कृष्ण के पास द्वारिकापुरी जाते हैं. भेंट में देने के लिए उनकी पत्नी पड़ोस से चावल मांगकर लाती है. सुदामा उस चावल की पोटली को लेकर द्वारकापुरी को प्रस्थान करते हैं. मार्ग में थकान होने के कारण सुदामा को नींद आ जाती है जहाँ श्री कृष्ण अपनी माया के प्रभाव से उनको द्वारका राजमहल के प्रथम द्वार पर पहुंचा देते हैं. यह देखकर सुदामा को बड़ा आश्चर्य होता है. वह द्वार पर खड़े द्वारपाल से श्री कृष्ण को अपना मित्र बताकर उनसे मिलने का आग्रह करते हैं. श्रीकृष्ण अपने बचपन के शाखा सुदामा से मिलने राजमहलों से दौड़ के आते हैं और उन्हें अंदर ले जाकर अपने आसन पर बिठाकर उनके पांव धोते हैं. यह देखकर महल के सभी लोग दंग रह जाते हैं. सुदामा अपने साथ ले आया चावल भेंट में देते हैं. श्री कृष्ण यह देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं. उन्होंने सुदामा के लाए चावल खाने शुरू किए. एक मुट्ठी खाकर एक तथा दूसरी मुट्ठी चावल खाकर उन्होंने सुदामा को दो लोक का मालिक बना दिया. जब वे तीसरी मुट्ठी चावल खाने लगे तो वहां खड़ी रुक्मिणी ने उन्हें रोककर कहा कि तीनों लोक सुदामा को दे देंगे तो स्वयं कहां रहेंगे प्रभु. इस पर श्रीकृष्ण ने अपने हाथ रोक लिए और सुदामा को दो लोक का मालिक बना दिया. इधर सुदामा कुछ दिन वहां रहने के पश्चात श्री कृष्ण से संकोच वश बिना कुछ कहे अथवा मांगे वापस लौटकर घर आते है. उन्हें देखकर आश्चर्य होता है, कि जहां उनका झोपड़ी था वहां उनका महल खड़ा हुआ था. इस लीला से यही सीख मिलती है कि मित्रता कैसे निभाई जाती है.
उक्त लीला का दर्शन कर श्रद्धालु हर्षित होकर श्रीकृष्ण भगवान का जयघोष करते हैं. उक्त लीला के दौरान पुरा परिसर दर्शकों से खचाखच भरा रहता है.