श्री राम लीला समिति बक्सर के तत्वावधान में नगर के रामलीला मंच पर चल रहे 21 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के क्रम में वृंदावन से पधारे श्री नंद नंदन रासलीला एवं रामलीला मंडल के स्वामी श्री करतार बृजवासी के सफल निर्देशन में दसवें दिन सोमवार को दिन में कृष्ण लीला के दौरान “गोवर्धन डाकू” प्रसंग का मंचन किया गया. जिसमें दिखाया गया कि डाकू गोवर्धन एक बहुत बड़ा लुटेरा है जो एक दिन अपने आप को बचाते-बचाते एक जगह चल रही भगवान श्रीकृष्ण की कथा में गया। छुपने के इरादे से वहीं बैठ गया। कथा में भगवान कृष्ण के श्रृंगार का वर्णन चल रहा था। जिसमें कथावाचक ठाकुर जी के सिर पर हीरे माणिक मोती लगे हुए सोने के मुकुट, कमर पर सोने की काथली, हाथ में सोने की छड़ी पैरों में सोने के नूपुर का वर्णन कर रहे थे। डाकू गोवर्धन ने सोचा कि जो व्यक्ति ऊपर से नीचे तक सोना पहनता है उसे लूटने से कितना फायदा होगा और इसी उद्देश्य से वो कृष्ण को ढूंढने लूटने वृंदावन की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसे उसी कथावाचक की बेटी भी मिली जो कृष्ण के दर्शन के लिए वृंदावन जा रही थी। दोनों एक साथ चल पड़े और रास्ते में दोनों ही ठाकुर जी का नाम रटते जा रहे थे। जहां डाकू गोवर्धन कृष्ण को लूटने के उद्देश्य से नाम बार-बार रट रहा था जब बहुत समय बाद वे दोनों वृंदावन पहुंचे तो कई दिन तक कृष्ण को ढूंढते रहे। कथावाचक की बेटी कृष्ण की भक्ति में विलीन होकर उन्हें पुकार रही थी और डाकू गोवर्धन सोने के लालच में उन्हें बार-बार पुकार रहा था। अंत में जब कृष्ण भगवान दोनों को दर्शन देते हैं तो कथावाचक की पुत्री उनके दर्शन मात्र से धन्य हो जाती है और कृष्ण उसे अपनी रास सखियों में शामिल होने का वरदान देते हैं। वहीं जब डाकू गोवर्धन कृष्ण का सोना लूटने के उद्देश्य से कृष्ण को छूता है तो उसका भाव बदल जाता है और वो लूटने का भाव छोड़कर सेवा भाव में परिवर्तित हो जाता है। भगवान कृष्ण उसे ये कहकर वरदान देते हैं कि मेरा नाम चाहे तुमने बुरे भाव से ही लिया हो लेकिन उसमें तुम्हारा पूरा समर्पण था और तुम्हारी हर सांस से मेरा नाम सुनाई दे रहा है, इसके लिए मैं तुम्हे अपना सखा होने का वरदान देता हूं।
उक्त लीला का दर्शन कर श्रद्धालु हर्षित होकर श्रीकृष्ण भगवान का जयघोष करते हैं. उक्त लीला के दौरान पुरा परिसर दर्शकों से खचाखच भरा रहता है.