
जीव जगत एवं जगदीश्वर अथवा जीव माया तथा शिव या सेवक, संसार तथा स्वामी इसी त्रिपुटी रहस्य को समझने पर सभी शास्त्रों ने जोर दिया है इस रहस्य का सही सही ज्ञान हो जाने पर मानव ज्ञानी या भक्त की श्रेणी में आ जाता है। श्रीमद् भागवत के परम श्रोता श्री परीक्षित जी को भगवान श्री कृष्ण की कथा भागवत का प्रवचन श्रवण कर।ते हुए श्री सुखदेव जी ने यही बात बताई की राजन- मानव मात्र ही नहीं अपितु जीव मात्र ईश्वर का अंश है यही कारण है कि जीव जब मानव का तन प्राप्त करता है और संसार के सुखों का भोग करना प्रारंभ करता है तो वह भोग में इतना मशगूल हो जाता है कि भूल जाता है मैं कौन हूं, कहां से आया हूं। वह विस्मृति हो जाता है कि यहां इसका स्थाई ठिकाना नहीं है यहां से जाना है किंतु मुझे कहां जाना है इस पर वह विचार शून्य हो जाता है और यही मूल कारण है उसके पतन का। पतन यहीं से धीरे-धीरे प्रारंभ हो जाता है।
भागवत कथा मानव को बताती है कि वह ईश्वर का अंश है मेरे हैं ,यह संसार मेरा बनाया हुआ है अतः न्यायसंगत तरीके से प्राप्त वस्तुओं का ही धर्मानुसार तथा न्याय संगत है साथ ही ईश्वर ने बताया कि न्याय एवं नीति से छल कपट प्रपंच और संयंत्र से अर्जित संपत्ति एवं भोगियों का मानव प्रतीक विधि एवं तेज दोनों का हरण कर लेता है ।व्यक्ति विवेक शून्य होकर कर्तव्य मूड हो जाएगा तथा पाप पुण्य के भेद से रहित होकर पाप कर्म को ही पुण्य कर्म समझकर उस कार्य में प्रवृत्त हो जाता। धीरे-धीरे वह पाप एवं पुण्य की भाषा में पाप की भाषा को ही पुण्य की भाषा मानने लगता है और समझने लगता है ।यही उसके पतन का मूल कारण होता है। हे परीक्षित मैं भगवान का दास हूं संपूर्ण संसार भगवान की कृति है सबके स्वामी भगवान है मैं वस्तुओं का उपयोग करने वाला नहीं हूं सबके स्वामी भगवान है अतः प्रसाद समझकर या आशीर्वाद समझकर जीवन जीने हेतु वस्तु को प्रसाद रूप में ग्रहण कर भगवान की सेवा में तत्पर रहना मेरा परम कर्तव्य एवं जीवन का उद्देश्य तथा चरम लक्ष्य यही है ।यही ज्ञान भागवत महापुराण से प्राप्त होता है। सर्वजन कल्याण सेवा समिति द्वारा आयोजित इस यज्ञ में 11:30 बजे पूर्णाहुति 1 से 4:00 बजे तक कथा एवं 5:00 बजे से विशाल भंडारा प्रारंभ हुआ। अपार जन समुदाय हजारों की संख्या में लाभान्वित हुआ। समिति आप सभी श्रद्धालुओं के प्रति आभार समर्पित करती है और अपेक्षा रखती है कि आप सभी का आशीर्वचन प्रतिवर्ष प्राप्त होता रहे”।