
द्वितीय दिवस भागवत कथा
रामेश्वर नाथ मंदिर रामरेखा घाट बक्सर
कथावाचक-श्री कृष्णानंद शास्त्री जी महाराज (पौराणिक जी)
मानवीय मूल्यों का ह्रास सभी युगों में देखा जाता है किंतु कलयुग तो अमानवीय मूल्यों का पोषक ,जनक तथा संवर्धक है। इसकी संपूर्ण आयु 4,32,000 वर्ष है 5,123 वर्ष अभी व्यतीत हुआ है और शेष आयु 4,26,877 वर्ष है। इसका आगमन अर्थात जन्म महाराज परम भागवत परीक्षित जी के कार्यकाल में हुआ। कलयुग का गुण एवं धर्म पुराणों में बताया गया है कि मानव समाज से धर्म का वनवास हो जाएगा, तपस्या नष्ट हो जाएगी।सत्य मानव समाज से इतना दूर चला जाएगा कि दिखाई नहीं देगा।मनुष्य कपट ,छल ,प्रपंच को ही अपना धर्म मानेगा। मन में इतनी दुष्टता होगी कि वह किसी को भी सुखी नहीं देख सकेगा। सरकारें जनता का खून चूस कर पीने वाली होगी, पुत्र पिता से द्वेष करेंगे ,साधु एवं विद्वान दुखी एवं विपन्न होंगे ,दुर्जन एवं पापी संपन्न तथा बलवान होंगे, स्त्रियां दुष्ट तथा परजीवी होंगी, भाई भाई का परम शत्रु बनेगा, गुरु शिष्य का संबंध अर्थ तक सीमित रहेगा। इस प्रकार इस कलयुग में न्याय ,सत्य तथा अच्छाइयों का दफन होगा। इस काल के दुर्गुणों के कारण महाराज परीक्षित ने कली को अपने राज्य में केवल चार ही स्थान दिए- द्रुत क्रीड़ा, सुरा- पान, हिंसा एवं वेश्या गमन स्थल। परंतु कली ने एक स्थान स्वर्ण भी माँग लिया ।तब से कलियुग इन पांचों ही स्थानों को इतना महत्वपूर्ण बना दिया कि आज संपूर्ण मानव समाज कलयुग का पुजारी बनता दिख रहा है। दुर्भाग्य तो यह है कि हम धन का गुलाम बन गए हैं। हमारा जीवन केवल धन के लिए ही हो गया है ।मानव जीवन में धन की आवश्यकता है यह भागवत का उपदेश है लेकिन धन के लिए ही मानव जीवन है यह कली का सिद्धांत है। कली के सिद्धांत पर चलने वाला दुर्योधन आदि का दुर्भाग्य हम सभी जानते हैं ।भागवत में भगवान श्री कृष्ण ने बताया है कि जो व्यक्ति लोभ एवं स्वार्थ के कारण वशीभूत होकर कलि के मार्ग का अनुगमन करता है उसके विनाश का तथा पांडव जैसे धर्म के मार्ग पर चलने वाले नरो के विकास का मार्ग मैं स्वयं प्रशस्त करता हूं ।इस कथा को सुनकर सभी लोग पूरी तरह से भाव विभोर हो गए ।