Wed. Apr 22nd, 2026

अवतार में ईश्वर के जन्म से लेकर उनके अपने धाम में पधारने तक जो जो कर्म भगवान करते हैं उसे हम लीला कहते हैं ।ईश्वर द्वारा उनके अवतार काल में किए गए कार्यों का ही शास्त्रों ,पुराणों एवं रामायण आदि ग्रंथों में वर्णन किया गया है जिसे हम सभी कहते एवं सुनते हैं वही कथा है। इनकी इन्हीं लीलाओं एवं कथाओं के माध्यम से संपूर्ण संसार के लोगों को जीवन जीने एवं मानव जीवन को सफल बनाने के विभिन्न गुण और ज्ञान महर्षि, मुनियों एवं महात्माओं ने दिए हैं ।ईश्वर के असंख्य अवतारों में राम अवतार और कृष्णा अवतार है। इन दोनों अवतारों को प्रमुख माना गया है। दोनों ने इस अखिल लोक को अपने आचरण एवं प्रवचन द्वारा उपदेश दिया है ।यही उपदेश अर्थात इनकी लीला रामायण एवं भागवत के नाम से संपूर्ण लोकों में विख्यात है। राम की लीला जो रामायण है वह मर्यादा का ग्रंथ है तथा श्री कृष्ण की लीला जो भागवत है वह लीला का ग्रंथ है। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम तथा कृष्ण को लीला पुरुषोत्तम कहा जाता है ।इन दोनों लीलाओं में अंतर हैं राम ने अपनी लीला मर्यादा में की है तथा श्री कृष्ण ने अपनी लीला में मर्यादा की है। मर्यादा में लीला करने वाले राम के सभी आचरण मनुष्य के लिए करणीय एवं अनुसरनीय है। जबकि लीला में मर्यादा स्थापित करने वाले लीला पुरुषोत्तम श्री कृष्ण की बहुत सी लीलाएं तो श्रवणी एवं मननीय हैं एवं अन्य आचरण करणीय है ।भागवत में पहले श्री राम की लीला तत्पश्चात श्री कृष्ण लीला का वर्णन करने का अभिप्राय है कि मानव समाज जब श्रीराम की मर्यादा में जीने की आदत डालने में खुद को सक्षम बना लेगा तभी उसे लीला पुरुषोत्तम श्री कृष्ण की लीला समझ में आ सकेगी ।अतः मानव के जीवन में राम की मर्यादा से समुचित श्री कृष्ण के आचरण का अनुसंधान ही संपूर्ण मानवता का प्रमाण है। श्री कृष्ण ने जन्म लेने के बाद खुद के 11 वर्ष 52 दिनों तक के कालखंड को प्रेम लीला में प्रतीत किया है। इस प्रेम लीला रहस्य को जो जान लेता है वही दुनिया का महान संत है ।श्री कृष्ण की प्रेम लीला की शुरुआत पूतना नामक राक्षसी के वध से होती है। यह एक अद्भुत दृश्य है की राक्षसी विषपान कराकर जिसे मारना चाहती है वह उसका विष प्रेम से पीकर उसे अपना गोलोक प्रदान करता है ।इनका संकल्प है जो कोई भी व्यक्ति मेरी शरण में आता है मैं उसे अपना लेता हूं ।भक्तों ने पूछा प्रभु वह आपकी शरण में विश्वास नहीं रखती थी अपितु आपके मरण में उसका अभिप्राय था ,भगवान ने कहा -मैं केवल इतना जानता हूं कि वह राक्षसी जिस वस्तु से सर्वाधिक प्रेम करती थी वह वस्तु थी विष और उसने अपनी प्रिय वस्तु विष मुझे प्रदान किया तथा मैं जिस वस्तु से प्रेम करता हूं वह है मेरा धाम इसलिए मैं अपना धाम उसे दे दिया ।यह अद्भुत प्रेम श्री कृष्ण को लीला पुरुषोत्तम बनाती है ।हमें इन कथाओं से जान लेना चाहिए कि हम जैसे हैं वैसे ही भगवान के पास जाना चाहिए पूतना राक्षसी थी उसका अपना संस्कार जैसा था वैसी ही वस्तु विष लेकर गई यदि दूध बनाकर पिलाती तो उसकी मुक्ति संभव नहीं थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया जिसको विष ही रहने दिया लेकिन मानव अपनी बुराई रूपी विष को अमृत में बदलकर बनावटी रूप लेकर भगवान के पास जाता है और भगवान उसे अपना प्रेम नहीं दे पाते क्योंकि उनके पास बनावटी प्रेम ही नहीं है यही प्रेम लीला है। लीला पुरुषोत्तम की इस कथा को सैकड़ों की संख्या में लोग इस कथा को सुनकर मंत्रमुग्ध हुए और श्री कृष्ण की और व्यासपीठ की जय-जयकार करने लगे”

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