
श्री कृष्ण की लीला अकथनीय एवं अकल्पनीय है। इन्होंने 25 वर्ष की उम्र में मथुरा में एक सभा का आयोजन कर अपना निश्चय सुनाया कि – हम अब मथुरा को छोड़कर समुद्र में द्वारकापुरी बनाएंगे ।हमारी राजधानी द्वारिका होगी और संपूर्ण आर्यावर्त हमारा राज्य होगा ।योग माया से सभी मथुरा वासी को द्वारिका भेजकर स्वयं बलराम के साथ पधारे श्री कृष्ण 16108 विवाह किए प्रत्येक पत्नी से 10 पुत्र एवं एक पुत्री का जन्म हुआ तथा सभी पत्नियों के लिए दी जाने वाली सुविधाएं एक समान एवं पर्याप्त थी ।नित्य एवं निरंतर पत्नियों के पास एवं साथ रहते थे। योगेश्वर श्री कृष्ण 16108 रूप धारण करके अपनी धर्म भार्या को गौरवान्वित करते थे ।यह विवाह लीला अद्वितीय एवं अलौकिक है ।उन्होंने अपने कार्यकाल 125 वर्षों के दरमियान अनेकों युद्ध किए एवं कराए जिसमें महाभारत अंत में हुआ। 125 वर्षों में पृथ्वी से दैत्य वृत्ति का विनाश कर दिया किंतु अपने परिवार के लोगों के प्रति उनकी चिंता बढ़ने लगी क्योंकि यह धन बल एवं प्रतिष्ठा से उन्मुक्त हो रहे थे ।भगवान ने ब्राह्मणों का जीवन भर सम्मान किया परंतु उनके वंश धारों से ब्राह्मणों का भयंकर अपमान हुआ ।ब्राह्मणों ने ऐसा अभिशाप दिया जो कभी किसी को नहीं मिला। 56 करोड़ यदुवंशियों का ब्राह्मण के एक अभिशाप ने विनाश कर दिया और श्री कृष्णा अपनी आंखों से देखते रहे ।यही श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र का सर्वोत्कृष्ट मिसाल है। वह अपने जीवन में सर्वाधिक महत्व धर्म का ही देते हैं संबंध एवं संबंधी उनके प्रियता के परिमाप का विषय नहीं है। जो धर्म अनुसार आचरण करता है वह उनका प्रिय है और जो धर्म प्रिय है ही नहीं वह उनका भी प्रिय नहीं है। यही ईश्वर का तत्व एवं रहस्य इस भागवत महापुराण में वर्णित है ।यही उपदेश एवं अंतिम संदेश भागवत महापुराण देता है अर्थात धर्म अनुसार ही संबंध श्रेष्ठ है।