ईश्वर का नर रूप में अवतरित होने का कोई एक कारण नहीं हो सकता इसके अनेक अवतार हैं तथा अवतार के अनेक कारण भी हैं किंतु श्री राम के अवतार का कारण उन सभी अवतारों से पृथक हैl प्रथम नर रूप में आकर संसार को यह बताना कि धर्म अनुसार जीवन जीने वाले मनुष्य के लिए संसार में कुछ भी संभव नहीं हैl श्री राम कथा में नारायण के अवतार का एक कारण नारद के मोह को बताया गया हैl शिव जी ने पार्वती जी को बताया कि एक समय की बात है कि नारद जी के श्राप से नारायण को अवतार लेना पड़ा lपार्वती जी के पूछने पर इतने बड़े तपस्वी देवर्षि नारद ने श्रा क्यों दिया भोलेनाथ ने बताया कि ध्यान से सुनो -मानव के जीवन में जब बड़ी उपलब्धि हो जाती है तब वह अहंकारी हो जाता है, वह सफलता का कारण स्वयं को मान लेता है ,वह खुद को ही सर्व समर्थ समझने लगता है और यही नासमझ ही रावण के अवतार का कारण बन जाती है lजब रावण आता है तो राम के बिना उसका अंत संभव नहीं है और रावण के अंत हेतु राम का आना जरूरी हो जाता हैl मोहग्रसित मानव इतना भयंकर बन जाता है कि वह रावण, कुंभकरण एवं मेघनाथ का जनक बन जाता है lनारद जी हिमालय में तपस्या कर रहे थे भगवान की कृपा से उनकी बुद्धि निर्मल हो गई lइंद्र द्वारा प्रसिद्ध कामदेव के प्रभाव से प्रभावित नहीं हुए lकामदेव पराजित होकर स्वर्ग चला गया यही उपलब्धि दुष्ट एवं अपवित्र मनोभूमि ही रावण की जननी हैl मोहग्रस्त मानव ही रावण का जनक एवं रावण भी हैl नारद को यह बात पच नहीं पाईl भगवान की कृपा हुई परंतु वह अपनी तब साधना मानने लगेl कहने लगे की मैंने कामदेव को पराजित कर दिया जो आज तक किसी ने नहीं कियाl वह मैंने कर दिखाया यही नारद का संसार को रावण कुंभकरण देने वाला मोह बन गयाl विनय पत्रिका में गोस्वामी जी ने कहा है कि काम पर विजय प्राप्त करने वाले नारद जी जब भगवान की कृपा भूल गए तब उनके मन में अहम भाव जगा की कामदेव को मैंने पराजित किया पुनः मोह ग्रसित हो गए कि आज तक किसी ने काम पर विजय प्राप्त नहीं किया मेरे अलावे तब अहंकार जागा lकेवल मैं ही काम को जिता तब नारद जी विश्व मोहिनी के चक्कर में फंसे और यह वही काम है जो कभी नारद जी से हlर माना था तब नारद जी मानते थे कि मैं भगवान का भक्त हूं वही काम आज नारद जी को इतना विवश कर दिया की वानर बनाकर सभा में नचा दिया lजब मनुष्य स्वयं को समर्थ मानने लगता है तब सर्वप्रथम मोह का रावण जब अहंकारी होता है तो, अहंकार का कुंभकरण जब कमी होता है तो, काम का मेघनाथ का जन्म होता हैl रावण -मोह,कुंभकरण-अहंकार,मेघनाथ- काम जब यह तीनों मनुष्य के यहां अवतार ले लेते हैं तब मानव समाज मानव समाज नहीं रह पाता वह समाज मात्र रावण समाज हो जाता है और रावण के समाज का अंत श्री राम के द्वारा ही संभव है अतः मानव समाज को राम से शिक्षा लेनी चाहिए कि वह स्वयं को करता न समझा करे अन्यथा नर ना रहकर वह रावण बन जाएगा और रावण की तरह ही दुर्दशा प्राप्त करते हुए समाज में महान अपयश का भाग बनेगाl बिना श्री राम कल्याण नहीं होगा मानव का परम कल्याण श्रीराम में ही निहित हैl
