
आज माता अहिल्या धाम अहिरौली बक्सर में आयोजित सनातन संस्कृति समागम में श्रीमद्भागवत कथा के सातवे दिन जगतगुरू रामानुजाचार्य स्वामी श्री अनंताचार्य जी महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा का रसपान कराया
श्री राम कर्म भूमि न्यास के तत्वावधान और केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के संयोजन एवं पूज्य जीयर स्वामी जी के सानिध्य व मार्गदर्शन तथा स्वमी रामभद्राचार्य जी के संरक्षण में आयोजित सनातन संस्कृति समागम में श्रीमद्भगवत कथा के सप्तम दिवस श्री अनंताचार्य महाराज जी ने कंस वध, उद्धव प्रसंग और रुक्मणि विवाह और सुदामा चरित का वर्णन किया।
कथा का वर्णन करते हुए स्वामी अनंताचार्य जी ने बताया:
श्रीकृष्ण अपनी बाल लीलाओं का समापन कर मथुरा पहुंचते हैं। वहां कंस के अत्याचारों से त्रस्त प्रजा और माता देवकी और पिता वासुदेव को मुक्ति दिलाने वह कंस से युद्ध करते हैं। भगवान ने कंस को पराजित कर दिया और उसका संहार किया। कंस का संहार कर जब माता-पिता को मुक्त करने भगवान कारागृह में पहुंचते हैं तो पुत्र को देख माता देवकी और पिता वासुदेव के आंखों से अश्रुधारा निकल पड़ती है। पिता भगवान को हृदय से लगाकर गोद में बिठा लेते हैं।
भगवान जब अपने माता पिता से कहते हैं कि मेरे होते हुए आपको मेरे होते हुए कितना कष्ट सहन करना पड़ा तब माता देवकी रोते हुए कहती है कि मेरे लिए बैकुठ से यहां आपको अवतार लेना कितना कठिन रहा होगा।
भगवान भक्तों के लिए कितना भी कष्ट सहने को तैयार रहते हैं जैसे माता अपने बच्चे से कितना भी कष्ट होने पर भी अपार प्रेम करती है। गाय इसका उदाहरण है कितने कष्ट से वह बछड़े को जन्म देती है और जन्म होते ही उसे वात्सल्य से अपने जीभ से सहलाती है।
भगवान अपने नाना उग्रसेन को आजाद कर उनका राज्याभिषेक करते हैं। उग्रसेन जब अपने पुत्र को देख दुखी होते हैं तो वह उग्रसेन जी कहते हैं कि मैंने किसी कंस का वध नही किया। मैंने अत्याचार का अंत किया है, संतो को कष्ट देने वाले का अंत किया, ईमानदारी, सत्य, सुचिता को स्थापित किया है।
कंस वध के पश्चात भगवान का यग्योपवित्र संस्कार होता है फिर उन्हें सांदीपनि ऋषि आश्रम शिक्षा के लिए भेजा जाता है।
माता पिता को 3 वर्ष तक बच्चों का लालन-पालन करना चाहिए 10 वर्ष तक डांट-फटकार करनी चाहिए 16 वर्ष का हो जाए तो मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए।
उद्धव प्रसंग का वर्णन करते हुए स्वामी जी ने कहा:
उद्धव गोपियों के पास श्रीकृष्ण का सन्देश लेकर जाते हैं। गोपियाँ उन्हें कहती हैं। ब्रज योग और ज्ञान की भूमि नही है यह प्रेम की भूमि है। उद्धव एक देह के प्रेम को त्यागकर ब्रम्ह और वेदांत का ज्ञान ग्रहण कर परमब्रम्ह में गोपियों को मन लगाने के लिए कहते हैं। गोपियाँ कहती हैं की हमारे पास केवल एक ही मन है जो उस मनमोहन के पास है, उद्धव जी तुम पागल हो यहां भूख श्याम की है और तुम कागज का टुकड़ा लेकर आये हो। उद्धव जी का मन उलझन में चला जाता है की असली कृष्ण यह ब्रज में हैं या वहां मथुरा में।
उद्धव जी भगवान से कहते हैं की ये गोपियाँ ही वेदांत की ऋचाएं हैं और ब्रम्ह के सूत्र हैं। मैन सत्य को पहचाना नही सत्य का उपदेश देने आ गया।
उद्धव गोपियों के चरणधूलि की वंदना कर और कृष्ण को हृदय में धारण कर अश्रुधारा लिए वापस मथुरा आ जाते हैं।
रुक्मणि विवाह का वर्णन करते हुए स्वामी जी ने बताया:
विदर्भ राजा भीष्मत की पुत्री रुक्मणि का स्वंयवर होने वाला था। शिशुपाल भीष्मत से आकर कहते हैं कि मैं रुक्मणि से विवाह करना चाहता हूँ आप रुक्मणि से कहिए की वो स्वयंवर में मुझे वर करे।
रुक्मणि एक ब्राम्हण के माध्यम से भगवान को संदेश भेजतीं है कि स्वंयवर से पूर्व कुलदेवी की पूजा के समय आप मुझे ले जाइये और अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कीजिये। मैं शिशुपाल से विवाह नही करना चाहती।
श्रीकृष्ण भगवान रुक्मणि का हरण कर उनसे विवाह सम्पन्न करते हैं।
सुदामा चरित का वर्णन करते हुए स्वमी जी ने बताया:
जब सुशिला अपने पति सुदामा को द्वारिका भेजती हैं। जब सुदामा अपने मित्र की नगरी द्वारिका में पहुंचते हैं तो द्वारपाल उन्हें रोक लेते हैं। सुदामा उनसे कहते हैं की जाओ कृष्ण से कहना की सुदामा आया है। द्वारपाल सुदामा का संदेश लेकर भगवान के पास पहुंचते हैं। भगवान दौड़ते हुए सुदामा के पास पहुंचते हैं और अपने हृदय से लगा लेते हैं। अपने सिंहासन पर सुदामा को बैठा कर अश्रु से उनके चरण धोते हैं। और पोटली में जो चांवल सुदामा की पत्नी सुशिला ने कृष्ण के लिए लाते हैं उसे ग्रहण कर 2 मुट्ठी चावल खा लेते हैं और सुदामा को 2 लोक दे देते हैं। तिसरी मुट्ठी जब वह खाने को उठाते हैं तो रुक्मणि उन्हें रोक लेती हैं। जब सुदामा वापस लौटे तो कृष्ण ने उन्हें सुदामापुरी का राजा बना दिया।
स्वामी जी ने कहा कि बक्सर को विश्व मानस पटल पर पहचान दिलाने ऐसा आयोजन पहले कभी न हुआ था न कभी होगा “न भूतो नभविष्यति”। ऐसे आयोजन इस भूमि में होता रहा तो यह भूमि स्वर्गलोक से भी ऊंचा होगा। बक्सर की भूमि देवलोक हो जाएगी। बक्सर को मानस पटल पर पहचान दिलाने और ऐसे आयोजन से इस भूमि को यज्ञमय बनाने आप बार-बार ऐसे सांसद अश्विनी चौबे जी को चुने ताकि इस धरती का स्थान स्वर्गलोक से भी ऊंचा हो।
स्वामी जी ने सनातम धर्म के प्रादुर्भाव के सम्बन्ध में कहा कि जबसे वेद है तभी से यह सनातन धर्म है और जब तक पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, जल, अग्नि रहेंगे तब तक सनातन धर्म रहेगा। यह था, यह है और यह हमेशा रहेगा।
कथा का रसपान कार्यक्रम के संयोजक राजेश कुमार सिंह उर्फ राघवजी , कृष्ण कांत ओझा, राजेंद्र ठाकुर, परशुराम चतुर्वेदी ,अरुण मिश्रा, प्रदीप राय, हिरामन पासवान, निर्भय राय, बैकुंठ शर्मा, अर्जित शाश्वत,अविरल शाश्वत, सुरभि चौबे, अनिल स्वामी ,रामकुमार सिंह, राजवंश सिंह,राजेंद्र सिंह, पुनीत सिंह, अनुराग श्रीवास्तव, सौरभ तिवारी,राहुल सिंह , दीपक सिंह, अभिषेक पाठक, त्रिभुवन पाठक, चेतन पाठक, विनय उपाध्याय, संजय साह,मदन दुबे, पूनम रविदास, दुर्गावती चतुर्वेदी ,जय प्रकाश राय, धन्नजय राय, इंद्रालेश पाठक, रमेश वर्मा, आशानंद , सुनील सिंह, निक्कू तिवारी, अक्षय ओझा,अंजय चौबे, ओमजी यादव, चंदन पांडेय, दीपक पांडेय, सहित हजारों लोग ने कथा का रस पान किया।