Wed. Apr 22nd, 2026

भगवान परशुराम जयन्ती एवं अक्षय तृतीया विमर्श

हे वैदिक सनातन धर्म प्रेमी जनों!

यह लघु लेख इस काल खण्ड के सभी नव यूवकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है , पठनीय तथा अनुकरणीय भी है।

भगवान परशुराम जी का अवतार

भगवान परशुराम का अवतार काल असंदिग्ध है।श्रीमद्देवीभागवत के–४–१६–१४ ।।

युगे चैकोन विंशोSथ त्रेताख्ये भगवान हरि:।

जमदग्नि सुतो जातो रामो नाम महाबल:।।

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काल गणना के अनुसार १९वें (उन्नीसवें) त्रेतायुग में भगवान नारायण का परशुरामजी के रूप में ब्राह्मण कुल ब्रह्मर्षि जमदग्नि जी की परम साध्वी पतिव्रता एवं पति प्रिया धर्मभार्या देवी रेणुका के गर्भ से (वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि जिसका विश्व प्रसिद्ध नाम अक्षय तृतीया है को ) जन्म हुआ। इनका जन्म स्थान उत्तर प्रदेश में (जमदग्नियां ) आज का अपभ्रंश नाम जमनियां है ।ये ३,९७,४९’१३४ तीन करोड़ सनतानबे लाख उनचास हजार एक सौ चौबीस वर्ष पूर्व अवतार लिये है।

आज भी जीवित हैं । वर्तमान समय में इनका आवास दो स्थानों पर है ।(१) महेन्द्राचल पर्वत पर ( २) तथा हिमालय में पृथ्वी के देवलोक काम्पील्यनगर में ।

ये चीर जीवी हैं।

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषण:।

कृप: परशुरामश्च सप्तैते चीर जीविन;।।

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भगवान नारायण के २४ चौबीस मुख्य अवतारों में १६ वां सोलहवां अवतार परशुराम के रूप में है——

 

अवतारे षोडशमे पश्यन् ब्रह्म द्रुहो नृपान्। भा० -१-३-२०

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श्रीहरि का परशुराम के रूप में अवतार का कारण ——

 

अवतारे षोडशमे पश्यन् ब्रह्म दुहो नृपान्।

त्रि:सप्त कृत्व:कुपितो नि:क्षत्रामकरोन्महिम्।।भा०-१-३+२०

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सम्पूर्ण सृष्टि का पालन करने के लिए पालक की आवश्यकता है जो काम भगवान नारायण स्वयं ही करते हैं। वे अपने अधीन चौदहों लोकों में अलग-अलग प्रजा पालक ‌नियुक्त करते हैं ।

पृथ्वी पर जो प्रजा पालक नियुक्त होते हैं उन्हें राजा कहा जाता है। ये वर्ण की दृष्टिकोण से क्षत्रिय होते हैं। इनका काम देश की रक्षा, सुरक्षा,पालन, न्याय करना तथा धर्म पूर्वक शासन व्यवस्था है। आज से लगभग चार करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी के राजा गण वेद विरुद्ध आचरण करने लगे एवं निहित स्वार्थ सापेक्ष शासन प्रणाली के अनुसार धर्म निरपेक्ष शासनादेश से पृथ्वी का शोषण करने लगे। ऋषि ,मुनि महात्मा,साधु,संत ब्राह्मण, देवता, गाय तथा विद्वानों का अनादर और श्रुति स्मृति विरूद्ध आचरण वाले राजाओं पर कुपित होकर भगवान नारायण ने ब्राह्मण कुल में ऋषि के घर परशुराम जी के रूप में अवतार लिया।

यह नारायण का आवेशावतार है

जो लोग ब्राह्मणों को निर्बल तथा कमजोर समझ कर‌ अपमान करते थे‌ ऐसे उद्दण्ड राजाओं को यह सीख देनी थी कि ब्राह्मण सर्व शक्तिमान है।

तप बल विप्र सदा बरियारा– श्रीराम चरित मानस

ब्राह्मण का बल तप है और तपस्वी ही महानतम बलशाली होता है । समस्त अस्त्र, शस्त्र,शास्त्र तप से ही संधारित,संचालित तथा संवर्धित होते हैं।

परशुराम जी का ज्ञान ——–

अग्रत:चतुरो वेदा: — ये चारो वेदों,छ: शास्त्रों, अष्टादशपुराणों,अष्टादशविद्याओं,वा चतुर्दशविद्याओं, के अधिकारी ज्ञाता थे। ऐसा ज्ञान भण्डार हैं।

परशुरामजी का बल——-

पृष्ठत:सशरं धनु:– इन्होंने २१ इक्कीश बार वेद विरुद्ध आचरण करने वाले अमित बलशाली राजाओं महाराजाओं, सम्राटों का शमन किया। इन्हों ने ही रावण को कीड़ा मकोड़ा समझ कर बन्दी बनाने वाले उस काल खण्ड के महान बलशाली सहस्त्र बाहु का एकाकी वध किया था ।ये कभी भी युद्ध में पराजित नहीं हुए। ऐसे अमित बलशाली हैं।

परशुराम जी का ब्रह्म तेज एवं क्षात्र तेज —

इदं क्षात्रं इदं ब्राह्मं शापादपि शरादपि।।

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ये इतने बड़े तपस्वी थे कि जो लोग अस्त्र शस्त्र से नहीं मारे जाते थे उन्हें श्राप देकर भस्म कर देते थे।

जो श्राप से भस्म नहीं हो सकते‌ थे उन्हें अस्त्रों शस्त्रों से नष्ट कर देते थे । यह इनका ब्रह्म तेज तथा क्षात्र तेज है।

परशुरामजी का‌ यज्ञ तथा दान —

उस काल खण्ड के सबसे बड़े यज्ञ कर्ता-धर्ता याजक थे।

इन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी का दान महात्मा कश्यप को कर दिया था।

इतना बड़ा दान आज तक किसी ने नहीं किया।

भगवान परशुराम का दैनिक जीवन-शैली –,

इन्होंने चार करोड़ वर्षों तक पृथ्वी को अपने अधीनस्थ रखा किन्तु ये स्वयं महेन्द्राचल पर्वत पर रह कर ऋषिवत जीवन यापन करते रहे तप साधना निरत हो कर ब्राह्मण के धर्म का पालन करते रहे।

तप: स्वाध्याय निरत तपस्वी वाग्विदाम्वर हैं।

ये सत्य, न्याय, धर्म तथा मानवता के पक्षधर हैं।

इनके समकालीन थे महाराज जनक, महाराज दशरथ, रावण,सहस्रार्जुन, आदि -आदि।

आज के ही दिन अर्थात् अक्षय तृतीया को ही त्रेतायुग का आरम्भ हुआ था ।यह अक्षय तिथि सर्वश्रेष्ठ तिथि है।आज के दिन का किया गया पाप एवं पुण्य दोनों अमित तथा अमिट होता है ।

क्या ? परशुरामजी क्षत्रिय कुल द्रोही थे —

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सामान्य जन यही मानते हैं कि परशुराम जी क्षत्रिय कुल घालक है । वे क्षत्रिय कुल के द्रोही हैं ।

श्री राम चरित मानस के बालकांड धनुष भंग प्रसंग में स्वयं परशुरामजी के मुख से यह बात कहलवायी गई है कि—

बाल ब्रह्मचारी अति कोही । विश्व विदित क्षत्रिय कुल द्रोही।।

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किन्तु यह बचन बाद विवाद का भाग है सिद्धान्त पक्ष नहीं है ।

यदि क्षत्रिय कुल मात्र के दुश्मन होते तो महाराज जनक तथा महाराज दशरथ आदि राजा गण भी तो उस समय थे ही । इनके साथ तो परशुराम जी के बहुत ही मधुर संबंध थे। यह सम्बन्ध इतना गहरा था कि जिस धनुष को श्री राम ने तोड़ा था वह शिव चाप परशुरामजी ने ही महाराज जंनक को दिया था ।

अत एव क्षत्रिय कुल शब्द यहां व्याख्येय है ।

भागवत कार ने बहुत ही सुन्दर समाधान किया है । भागवत के प्रथम स्कन्ध – तीसरे अध्याय-श्लोक बीस में अवतार का कारण बताते हुए कहा कि

अवतारे षोडशमे पश्यन् ब्रह्म द्रुहो नृपान्।

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ऐसे राजा गण जो पृथ्वी का शासन वेद विरुद्ध करते थे। इस विचार धारा के अधिकांश राजा हैहयवंश के थे जिनका नाम पुराण आदि धर्म शास्त्रों में वर्णित है। जो वर्ण धर्म के आचरण का पालन नहीं करते हैं, साथ हीं अपने वर्ण धर्म का परित्याग करके अन्य वर्ण के धर्मों का आचरण करते हैं, ऐसे वेद विरुद्ध जीवन जीने‌ वाले अपने धन,बल, पद, अधिकार का निहित स्वार्थ की पूर्ति में नियोग कर के अन्याय तथा अनीति पूर्वक कार्य करने वाले वर्ण बन्धुओं को ही महा पापी कहा जाता है।

जिस क्षत्रिय कुल के द्रोही परशुरामजी हैं वह क्षत्रिय कुल ऐसा अधम कुल है जिसका अपर नाम‌ क्षत्रबन्धु‌ है । जो हैहय वंश था जिसका नेता सहस्रार्जुन था । ये लोग राजा होने के बाद भी राज धर्म से रहित मन मुखी शासन व्यवस्था द्वारा राज्य करते थे‌ जिसके कारण सनातन वैदिक धर्म की क्षति हो रही थी । इन्हीं के सम्बन्ध में यहां पर उल्लेख किया गया है क्योंकि परशुरामजी इसी हैहयवंशीय क्षत्रियों के संघारक हैं।

अन्य क्षत्रिय राजपूत जो धर्मानुसार राज्य करते थे उन पर तो परशुराम जी का वरद हस्त था हीं। भगवान श्रीराम स्वयं ही कहते हैं कि महाराज हमारा वंश उन अधम क्षत्रियों का वंश नहीं है ।

विप्रवंश के अस प्रभु ताई।अभय होई जो तुम्हहीं डेराई।।

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हमारे वंश पर तो आप ब्राह्मणों की विशेष कृपा है‌ हम सदा ही आप के शरणागत है यही कारण है की हमारा वंश संसार में निर्भय है । यह निर्भयता‌ तो आप ने हमारे‌ वंश को पहले‌ से ही दे रखी है ।तभी तो मैंने यह धनुष तोड़ कर सनातन धर्म की रक्षा की है।

 

सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुबर के ।उघरे पटल‌ परसु धर मति के ।।

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परशुराम जी प्रसन्न हो गये‌ राम अब मेरे धनुष की प्रत्यञ्चा चढाओं मेरा और मेरा आशीर्वाद है धर्म की रक्षा करने में तत्पर हो जाओ अब में महेन्द्र पर्वत पर जा रहा हूं तुम पृथ्वी को सम्हालो।

शास्त्र के अनुसार सभी‌ वर्णों के दो कुल हैं । यहां वेद विरुद्ध आचरण रत अधम क्षत्रिय कुल का ग्रहण किया गया है ।न कि धर्मानुसार आचरण निरत वेद, ब्राह्मण,गो,देव, संत के हितैषी क्षत्रिय कुलों का ।

अतः क्षत्रिय कुल द्रोही कहना सर्वथा अनुचित है ।

श्री परशु जयंती मनाने वालों को साधुवाद के साथ परामर्श।

भारत वर्ष भगवान नारायण के इस सोलहवें आवेशावतार को परशुरामजी की जयंती के रूप में मनाता है ।यह अत्यंत प्रशंसनीय है। मैं उन्हें साधुवाद के साथ ही उनके साथ भी खड़ा हूं।

किन्तु प्रत्येक परशुराम भक्त यह ध्यानपूर्वक सुनें परशुरामजी महेंन्द्र गिरि से देख रहे हैं कि मेरी जयन्ती में उपस्थित लोगों में मेरी उपस्थिति कितने लोगों में है अर्थात मेरे द्वारा स्थापित सत्य,न्याय, धर्म, के मार्ग पर चलने वाले कितने लोग हैं ।

यदि परशुरामजी का आदर्श आप के जीवन में यथार्थ है तो आप अवश्य महान हैं ।आप की परशुराम जयन्ती आप के लिए अभ्युदय कारिणी अवश्य ही होगी।

अगर सहस्त्र बाहु का जीवन आप का जीवन है और आप परशुराम जी की जयन्ती मना रहे हैं तो फिर आप स्वयं विस्तारपूर्वक विचार करें कि आप कर क्या रहे हैं।

अब मैं आचार्य श्रीकृष्णानन्द शास्त्री पौराणिक सिद्धाश्रम धाम बक्सर भगवान श्रीपरशुराम जी के प्रति कृतज्ञता का यह पुष्प उनके श्री चरणों में समर्पित करते हुए उनसे प्रार्थना करता हूं कि

सर्वे भवन्तु सुखिन:सर्वे सन्तु निरामया:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्।।

के साथ मिल लेख भगवान परशुराम जी के समस्त अनुयायियों के भेंट कर रहा हूं।।

हरि: ॐतत्सत्।। दिनांक –३०-०४-२०२५ दिन बुधवार।।

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