Wed. Apr 22nd, 2026

आज की कथा के दौरान पूज्य महाराज श्री बताया कि शास्त्र हमें जीवन का सही मार्ग दिखाते हैं। वे बताते हैं कि क्या उचित है और क्या अनुचित। गुरु हमारे जीवन की दिशा तय करते हैं वे अज्ञान के अंधकार से हमें ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। और माता-पिता… हमारे पहले गुरु होते हैं। उनका प्रेम, त्याग और अनुभव अनमोल होता है। जो व्यक्ति शास्त्रों के सिद्धांतों का पालन करता है, गुरु की वाणी को शिरोधार्य करता है और माता-पिता की सेवा करता है उसका जीवन न केवल सफल होता है, बल्कि सार्थक भी बनता है।

तिलक लगाने से मन एकाग्र होता है, आत्मबल बढ़ता है और भगवान का आश्रय मिलता है। तिलक लगाना न केवल धार्मिक परंपरा है, बल्कि आत्मा की रक्षा का एक अदृश्य कवच भी है। जिसके मस्तक पर तिलक होता है। जो तिलक का त्याग कर देता है, वह धीरे-धीरे आध्यात्मिक ऊर्जा से दूर होता चला जाता है और संसार के मोह में फंसकर पापकर्मों की ओर प्रवृत्त हो सकता है।

अगर भगवान से मिलना है, तो अपने मन के भावों को शुद्ध बनाना होगा। भगवान बाहरी दिखावे या आडंबरों से प्रसन्न नहीं होते, वे तो केवल हृदय की सच्चाई को देखते हैं। उन्हें निष्कपट प्रेम चाहिए ऐसा प्रेम जिसमें कोई स्वार्थ न हो, कोई छल न हो, केवल समर्पण हो। भगवान को वही मनुष्य प्रिय होता है, जिसके भीतर सच्चाई बसती है, जिसका मन निर्मल होता है, और जिसकी वाणी में विनम्रता होती है।

आजकल के दौर में डॉक्टर चेहरे बदल देते हैं, और पार्लर वाले चेहरे पर इतनी परतें चढ़ा देते हैं कि असली पहचान ही खो जाती है। बाहरी सुंदरता का इतना शोर है कि लोग भीतर झाँकना ही भूल गए हैं। सच्चाई यही है — तन को सुंदर बनाने से कुछ नहीं होगा, जब तक मन सुंदर न हो। असली सुंदरता चेहरे में नहीं, चरित्र में होती है। वह मुस्कान ही क्या जो बनावटी हो? वह चमक ही क्या जो भीतर के अंधकार को छिपा रही हो।

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