
बसंत पंचमी क्यों मनाते है?
05 फरवरी, 2022 (शनिवार)
बसंत पंचमी माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जाती है। आज ही के दिन से भारत में बसंत ऋतु का आरम्भ होता है। इस दिन सरस्वती पूजा भी की जाती है। बसंत पंचमी की पूजा सूर्योदय के बाद और दिन के मध्य भाग से पहले की जाती है। इस समय को पूर्वाह्न भी कहा जाता है ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक बसंत पंचमी का दिन काफी शुभ माना जाता है इसलिए इस दिन को अबूझ मुहूर्त के तौर पर भी जाना जाता है। इस दिन किसी भी शुभ काम को करने के लिए मुहूर्त देखने या पंडित से पूछने की जरूरत नहीं पड़ती। इस दिन पीले रंग का वस्त्र पहनकर पूजा करना भी शुभ होता है। बसंत पंचमी का दिन शादी के बंधन में बंधने के लिहाज से भी बहुत शुभ माना जाता है। इसके अलावा गृह प्रवेश से लेकर नए कार्यों की शुरुआत के लिए यह दिन अत्यंत शुभ माना गया है।
बसंत पंचमी पूजा का शुभ मुहूर्त
पूजा मुहूर्त – सुबह 07:07:19 से 12:35:19 तक।
अवधि – 5 घंटे 28 मिनट।
क्यों मनाई जाती है बसंत पंचमी
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान ब्रह्मा जी ने समस्त संसार की रचना की। उन्होंने मनुष्य, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे बनाए लेकिन फिर भी उन्हें अपनी रचना में कमी लगी। इसलिए ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे चार हाथों वाली एक सुंदर स्त्री प्रकट हुई। उस स्त्री के एक हाथ में वीणा, दूसरे में पुस्तक, तीसरे में माला और चौथा हाथ वर मुद्रा में था। ब्रह्मा जी ने इस सुंदर देवी से वीणा बजाने को कहा। जैसे ही उन्होंने वीणा बजायी ब्रह्मा जी के बनाई हर चीज में मानो सुर आ गया। इसके बाद ब्रह्मा जी ने उन्हें वीणा की देवी सरस्वती का नाम दे दिया। वह दिन बसंत पंचमी का था। यही कारण है कि हर साल बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का जन्मदिन मनाया जाने लगा और उनकी पूजा की जाने लगी।
माँ सरस्वती की पूजा विधि
सुबह के समय स्नानादि करके सफ़ेद अथवा पीले वस्त्र धारण करें। पूजा के लिए पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ मुख करके बैठ जाएं और एक चौकी लें, उस पर गंगाजल छिड़क कर पीला या सफेद रंग का वस्त्र बीछा दें। सफ़ेद कमल पर बैठी वीणा धारिणी मां सरस्वती की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। पूजा स्थान पर वाद्य यंत्र और किताबें रखें और बच्चों को भी पूजा स्थल पर बैठाएं। अब माँ सरस्वती को पीले फूल और सफेद चंदन अर्पित करें। इसके पश्चात माता को सिन्दूर व अन्य श्रृंगार की सामग्री चढ़ाएं। इसके बाद मां सरस्वती के चरणों में गुलाल अर्पित करें।
अब सरस्वती कवच का पाठ करें। इस दिन ‘श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा’ मंत्र का 108 बार जाप करें। माँ सरस्वती का पूजन करने के बाद पुस्तकों और वाद्य यंत्रों की भी अवश्य पूजा करें। इसके बाद बसंत पंचमी की कथा सुनें या पढ़ें। अंत में माँ सस्वती की धूप व दीप से आरती उतारें और पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा मांगे।