
आज से विवाह से संबंधित समस्त मांगलिक कार्य 4 महीना के लिए स्थगित हो जाएंगे पुनः 25 नवंबर 2022 से मांगलिक कार्य प्रारंभ होंगे।आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। देवशयनी एकादशी के दिन से ही भगवान विष्णु शयनकाल में चले जाते हैं, इसलिए इसे देवशयनी एकादशी कहते हैं। देवशयनी एकादशी को हरिशयनी एकादशी और पद्मनाभा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार माना जाता है कि इस एकादशी के बाद से चार महीने के लिए भगवान विष्णु निद्रा में चले जाते हैं। चार महीने की इस अवधि को चतुर्मास कहते हैं। इस दौरान कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है। *देवशयनी एकादशी पूजा विधि और शुभ मुहूर्त* देवशयनी एकादशी 10 जुलाई 2022, दिन रविवार को है। एकादशी तिथि 9 जुलाई, दिन मे 11 बजकर 23 मिनट पर शुरू होगी।एकादशी तिथि 10 जुलाई प्रातः 9:31 तक रहेगी ।पारण का समय – 11 जुलाई 2022 को सुबह 5 बजकर 56 मिनट से 8 बजकर 36 मिनट तक रहेगा। *पूजा विधि* इस दिन सुबह जल्दी उठकर, स्नान आदि से निवृत्त होकर, पूजा के स्थान की अच्छी तरह से सफाई करें।इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित करें।भगवान विष्णु को पीले वस्त्र, पीले फूल, पीला प्रसाद और पीला चंदन आर्पित कर, भगवान विष्णु को पान-सुपारी चढ़ाएं। फिर जगत के पालन श्री हरि विष्णु के आगे दीप जलाएं और पूजा करें।देवशयन एकादशी के दिन भगवान विष्णु के मंत्र ‘‘ *सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जमत्सुप्तं भवेदिदम्।* *विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्व चराचरम्।।”* का जाप अवश्य करें।देवशयनी एकादशी के दिन पहले भगवान विष्णु को शयन कराएं, उसके बाद ही खुद सोएं। *पौराणिक महत्व* पौराणिक कथा के अनुसार बहुत समय पहले मान्धाता नाम का एक राजा था। राजा काफी अच्छा और नेक-दिल था, जिस कारण उसकी प्रजा हमेशा उससे काफी खुश रहती थी। एक बार राज्य में 3 साल तक बारिश नहीं पड़ी। इससे राज्य में अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गयी। जो प्रजा पहले खुश रहा करती थी, वो अब निराश और दुखी रहने लगी।अपनी प्रजा का यह हाल देखकर राजा ने अपनी प्रजा को इस दुख से निकालने के लिए जंगल में जाना उचित समझा। जंगल में जाते-जाते राजा, ऋषि अंगिरा के आश्रम पहुंच गया। ऋषि ने राजा से उसकी परेशानी की वजह पूछी तो राजा ने सारा दुख ऋषि के सामने जाहिर कर दिया। तब ऋषि ने राजा को आषाढ़ी एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी।ऋषि की बात मानकर राजा वापस अपने राज्य लौट आया और अपनी प्रजा से आषाढ़ी एकादशी के व्रत को निष्ठापूर्ण करने की सलाह दी। व्रत और पूजा के प्रभाव का असर कुछ ऐसा हुआ कि राज्य में एक बार फिर से बारिश हुई, जिससे पूरा राज्य एक बार फिर से धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।