Wed. Jun 17th, 2026

श्री रामलीला समिति,बक्सर के तत्वावधान में रामलीला मैदान स्थित विशाल मंच पर चल रहे 21 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के दौरान आज बीसवें दिन शुक्रवार को श्रीधाम वृंदावन से पधारी सुप्रसिद्ध रामलीला मण्डल श्री श्यामा श्याम रासलीला संस्थान के स्वामी श्री नन्दकिशोर रासाचार्य जी के सफल निर्देशन में दिन में कृष्ण लीला के दौरान “सुदामा चरित्र”‘ प्रसंग का मंचन किया गया। जिसमें दिखाया गया कि वासुदेव जी श्री कृष्ण को विद्या ग्रहण करने के लिए गुरु संदीपन की पाठशाला में भेजते हैं। इधर सुदामा भी विद्या अध्ययन के लिए आ रहे होते हैं। तो अचानक मार्ग में सुदामा के पैर में कांटा चुभ जाता है और वह कष्ट के कारण प्रभु का नाम लेकर जोर से चिल्लाते हैं।श्रीकृष्ण इस आवाज को सुनकर सुदामा के समीप है,और उनके पैर में लगे कांटे को निकालते हैं । और एक दूसरे का परिचय होता है। एक ही पाठशाला के शिष्य होने की जानकारी पर श्रीकृष्ण और सुदामा की आपस में मित्रता हो जाती है, और दोनों साथ-साथ गुरु संदीपन के आश्रम में पहुंचते हैं। गुरुदेव दोनों के शिक्षा प्रदान करते हैं । एक दिन सुदामा अपने पाठ को भूल जाते हैं गुरुदेव उनको दंड स्वरूप जंगल से लकड़ी काटकर लाने को कहते हैं यह देख कर मित्रता निभाने के लिए श्रीकृष्ण भी अपना पाठ भूलने का बहाना बनाते हैं गुरुदेव श्री कृष्ण और सुदामा दोनों को जंगल से लकड़ी लाने को भेजते हैं । आश्रम से उन दोनों को मार्ग खाने के लिए चना मिलता है। वन में सुदामा को भूख लगती है वह कृष्ण के हिस्से का चना भी खा जाते हैं। जब गुरुदेव को इस बात की जानकारी होती है तो वह क्रोध में आकर सुदामा को शाप दे डालते हैं। दोनों की शिक्षा पूरी होने पर अपने गृहस्थान को लौट आते हैं। आगे जाकर सुदामा गरीब ब्राह्मण होता है। और श्रीकृष्ण द्वारिका का नरेश। वहीं दूसरी तरफ दिखाया गया कि गुरु संदीपन के यहां श्री कृष्ण और सुदामा का विद्या अध्ययन पूर्ण होने पर वह अपने नगर को लौट कर आते हैं । समयानुसार सुदामा जी की वसुंधरा नामक स्त्री से विवाह होता है । दिन पर दिन सुदामा अत्यंत गरीब हो जाते हैं और श्री कृष्णा द्वारकापुरी के राजा हो जाते हैं। बहुत बार पत्नी के हठ करने के पश्चात सुदामा एक दिन अपने बचपन के मित्र श्री कृष्ण के पास मदद मांगने के लिए जाने को तैयार होते हैं। ब्राह्मणी श्री कृष्ण को भेंट में देने के लिए पड़ोस से चावल लेकर आती है। और चावल की पोटली लेकर सुदामा द्वारकापुरी के लिए चल देते हैं। मार्ग में नदी मिलती है जहां श्रीकृष्ण केवट के भेष में उन्हें नदी पार कराते है। चलते चलते रात्रि हो जाती है। काफी थकान होने पर सुदामा एक वृक्ष के नीचे सो जाते हैं तब श्री कृष्ण अपने योग माया से सुदामा को महल के प्रथम द्वार तक पहुंचा देते हैं । प्रभु अपने बचपन के मित्र सुदामा से मिलने महलों से द्वार तक दौड़ कर आते हैं और अपने मित्र का पांव पखारते हैं। सुदामा संकोच वश श्रीकृष्ण से कुछ भी नहीं मांग पाते है। उनके कुछ नहीं मांगने पर भी श्री कृष्ण मुट्ठी भर चावल के बदले दो लोक की संपत्ति प्रदान करते हैं । इस दृश्य को देख दर्शक भावविभोर हो जाते हैं। इस दौरान पुरा रामलीला परिसर श्रद्धालुओं से खचाखच भरा हुआ था ।

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