सर्वजन कल्याण सेवा समिति द्वारा आयोजित 17वां धर्म आयोजन, पंचम दिवस दिनांक 17जून 2025 की कथा –
“मारकंडे जी ने कहा है, हे जैमिनी जी धर्म ही एकमात्र शाश्वत तत्व है जो सुख शांति समृद्धि के साथ संपूर्ण विश्व के कल्याण में समर्थ है । धर्महीन मनुष्य पशु के समान होता है जिसका कोई चरित्र नहीं होता। धर्महीन मनुष्य मानव रूप में हिंसक जानवर होता है जिसका कोई सिद्धांत एवं संस्कार नहीं होता ।इस संबंध में अनेकों उदाहरण शास्त्रों में विद्यमान है। दानव तथा मानव इस प्रमाण के प्रतीक है। रावण धर्महीन तथा श्री राम धर्मवlन है ।हमें उन दोनों के जीवन से सीख लेने की जरूरत है। रावण के पास अस्त्र, बल ,विद्या, वैभव, कीर्ति , धन ,संपत्ति, शक्ति, शोहरत, सिद्धि के साथ ही तीनों लोकों की सभी सुंदरियों का स्वामित्व भी है स्वर्ण की लंका, अपराजित पुत्र मेघनाद , अद्वितीय बलशाली भाई कुंभकरण ,विश्व सुंदरी पत्नी मंदोदरी, विश्व विख्यात भक्ति एवं विद्वान महामंत्री अनुज विभीषण ,अनेक विश्व विजेता योद्धाओं से खचाखच भरा दरबार फिर भी धर्म धारण नहीं करने के कारण उसका महाविनाश एक ऐसे मानव के द्वारा होता है जिसके पास रावण की तुलना जैसी कोई एक भी वस्तु नहीं है ।आप विचार कर सकते हैं प्रभु श्रीराम एक नर हैं। रहने के लिए ना घर है ,ना ही भोजन। दर-दर जंगल में रंगते रहते हैं एक अनुज लक्ष्मण और साथ में कोई नहीं ।एक पत्नी भी थी जिसका हरण हजारों विश्व सुंदरियों के साथ रहने वाला रावण चुराकर ले गया किंतु राम के पास धर्म है राम संपूर्ण धर्म के साथ जीवन जी रहे हैं और रावण संपूर्ण धन के साथ जीवन जी रहा है ।धर्म में तप तथा त्याग होता है जबकि धन में भोग तथा संग्रह। यही कारण है कि समस्त वैभव के स्वामी रावण को वैभवहीन समस्त धर्म के पालनकर्ता श्री राम ने पराजित ही नहीं अपितु विनष्ट कर दिया। इससे सिद्ध होता है कि धर्म ही संपूर्ण सृष्टि में एकमात्र सनातन शक्तिशाली है। धर्म ही सबसे बड़ा बल है और यह जिसके पास है वह धर्मात्मा ही सर्वश्रेष्ठ बलवान है ।अतः हे महामना धर्म का अनुष्ठान नित्य करना चाहिए तथा अधर्म का सतत त्याग करना ही मानव का परम कर्तव्य है”।