श्री रामचरित में विवाह का बड़ा ही विचित्र वर्णन है यदि रामायण के विवाह के रहस्य का सही उद्घाटन मानव मन में हो जाए तो पुरुषार्थ चतुर्थ पूर्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाएगाl रामायण में कुल चार विवाह का वर्णन हुआ हैl एक देह विवाह शिव -पार्वती का जो सर्वथा ब्रह्म विवाह की विधि से संपन्न हुआ और सफल भी तथा दूसरा विवाह नर विवाह श्री सीताराम का जो स्वयंवर विवाह थाl किंतु ऋषियों ने ब्रह्म विवाह कराकर वैदिक परंपरा का अनुपालन किया तथा कराया एवं समाज को शिक्षा दिया कि स्वयंवर विवाहों के होने पर भी ब्रह्म विवाह ही उत्तम है lअतः स्वस्थ मानव समाज को ब्रह्म विवाह का ही आसरा लेना हैl तीसरा विवाह ऋषि विवाह- देवर्षि नारद से संबंधित है lनारद जी कामदेव से वशीभूत होकर विवाह करना चाह रहे थे अतः यह विवाह भंग हो गया नारद जी की बड़ी दुर्गति हो गई यह वानर बन गए इससे शिक्षा मिलती है कि kami बनकर मात्र वासना से प्रेरित जो विवाह है वह अत्यंत कष्टप्रद होता है तथा मानव को तो छोड़ो देव ऋषि को भी वानर बनाकर अपयश एवं अपकीर्ति प्रदान करता है lचौथा विवाह राक्षसी का विवाह है l यह विवाह मात्र भोग की भावना से प्रेरित होकर वासना की ज्वाला से दर्द था अतः वासन ने नाक कान कटवा कर विवाह को विनाश कर दिया lभारतीय सनातन पद्धति में विवाह का मुख्य उद्देश्य है योग जिसके द्वारा स्त्री पुरुष मिलकर अंत रस में योग साधना को सम्मिलित करते हैं तथा भोग भावना को नियंत्रित करते हैं इसके विपरीत भोग भावना वासना से विवाह या तो विनष्ट हो जाता है या विनष्ट कर देता हैl अतः देवर्षि नारद का काम एवं सुपररेखा का वासना दोनों विवाह असफल हो गए जबकि शिव पार्वती सीताराम का विवाह सफल एवं सिद्ध हुएl वर्तमान समय में इन दोनों विवाहों के अतिरिक्त सभी विवाहों का हेतु कम एवं वासना हो गया है अतएवं विवाह संस्कार विनष्ट हो गया हैl हेतु दूषित होने से विवाह क्रिया भी बदबूद्वार हो गई हैl अभी जो विवाह हो रहे हैं उन विवाहों में वरमाला या जयमlल तथा रिंग शिरोमणि यह दोनों क्रमशः राक्षस राक्षसी हैं जिनका काम एक मात्र है कि यह विवाह पद्धति को विनष्ट कर देते हैंl अतः मृत विवाह होने के कारण मानव रूप में दानव संतान जन्म लेती हैं lजमाल एक बिस्तर नाग है जिसे हम नागमाल कहे तो अच्छा है lबेशर्मी की सीमा पार कराकर निरस्त की विधि पर बैठने वाला यह नागपाल विवाह मुहूर्त को डस लेता है इसके डंक से मुहूर्त मृत होकर साथ छोड़ देता है तब विवाह बिना मुहूर्त का होने के कारण मृत्यु विवाह अर्थात अशुभ विवाह हो जाता है जो राक्षस बुद्धि संपन्न संतान का जन्मदाता हैl यही से सनातन धर्म के नाशक मानव समाज बढ़ता पलता है जो सब तरह से हटकर हैl श्री सीताराम विवाह से मानव समाज को शिक्षा लेकर विधि विधान से ब्रह्म विवाह करना चाहिए जो सनातन धर्म का जनक एवं रक्षक है l