
ईश्वर की लीला उनका धाम उनका नाम एवं रूप में चारों नित्य अविनाशी एवं चिरंतन है| श्रीकृष्ण ने11 साल 52 दिन गोकुल एवं वृंदावन में रहकर प्रेम लीला अर्थात अद्भुत बाल लीला की है| मिट्टी खाकर मुंह में संपूर्ण ब्रह्मांड को दिखाना स्तनपान करते हुए पूतना का उद्धार घर-घर माखन चुराकर खाना उखल में बंद कर दो वृक्षों का उद्धार करना बिना अस्त्र-शस्त्र अनेकों राक्षसों का वध करना पश्चात मथुरा में प्रवेश करते ही प्रेम लीला का समय समाप्त करने की घोषणा कर देना |मथुरा में श्री कृष्ण की रण लीला कंस वध के साथ ही प्रारंभ होती है|जो लगातार 13 वर्षों तक चलती है |श्री कृष्ण की रणलीला सर्वाधिक आश्चर्यजनक एवं क्रांतिकारी है |महाभारत युद्ध में मात्र 18 अक्षौहिणी सेना थी और यह युद्ध 18 दिनों तक चला था किंतु श्री कृष्ण एवं बलराम मात्र दोनों भाई मिलकर 23 23 अक्षौहिणीसेना लेकर 18 बार आक्रमण करने वाले जरासंध को पराजित किए यह युद्ध 13 वर्षों तक रुक रुक कर चलता रहा महान आश्चर्य तो यह है कि एक पक्ष में मात्र दो सेनानी श्री कृष्ण एवं बलराम तथा विरुद्ध में दुनिया के सबसे बड़े बड़े पीर 23 अक्षौहिणी सेना के साथ अर्थात 23 महाभारत के समान (बराबर )युद्ध दोनों भाइयों ने किया |जो सृष्टि में आज तक असंभव रहा है अर्थात किसी ने नहीं किया है |25 वर्षों की उम्र हुई तो श्रीकृष्ण ने मथुरा को छोड़कर द्वारका में निवास किया और वहां पर सर्वप्रथम विवाह लीला प्रारंभ हुई और 35 वर्ष की उम्र तक यह लीला चलती रहे श्री कृष्ण ने 10 वर्षों में 16108 विवाह किया जो अपने आप में मिसाल है| एक एक पत्नी से 10-10 बेटे एवं एक एक बेटियां को जन्म दिया |द्वारकापुरी में छप्पन करोड़ यदुवंशी थे तथा 3 करोड़ अध्यापक| द्वारिकापुरी संपूर्णत सोने की धातु से बनी थी |35 वर्ष से लेकर 125 वे वर्ष तक श्री कृष्ण ने धर्म की स्थापना एवं और अधर्म के विनाश हेतु राजनीति के तहत साम्राज्य लीला की जो आश्चर्यजनक है| श्रीमद्भागवत के माध्यम से मानव समाज को यह शिक्षा दी गई है कि मनुष्य को विपत्तियों से घबराना नहीं चाहिए सतत् उद्योगसील एवं प्रयासरत रहकर कर्तव्य का अनुपालन करते रहना चाहिए |श्री कृष्ण के जीवन में पग-पग पर समस्याएं आती रही और वे डटकर सामना करते रहे फलतः सफलता उनके चरणों में लोटती रही |”उद्योगिनं पुरुष सिंहमुपैतिम लक्ष्मी” |इस सूक्ति का जो अक्षरस:पालन करता है वही व्यक्ति इस संसार में विजयी बनकर मोक्ष तत्व को प्राप्त करता है |सुखदेव जी ने कहा हे राजन यह भागवत मानव समाज को जीवन जीने हेतु प्रेरित एवं संपोषित करने वाला महान ग्रंथ है| जिसके श्रवण से व्यक्ति का जीवन संपूर्ण देवी गुणों से संपन्न हो जाता है|