Fri. Jun 19th, 2026

राजा परीक्षित को जब श्राप मिला तो वे काफी घबराए हुए थे।उनका समय बेचैनी में बीतने लगा। तभी उनके यहा संत महात्माओं का आगमन होता है। इनका दर्शन कर प्रणाम करते हुए राजा परीक्षित ने कहा कि महात्मन मेरे पास जीवन जीने के लिए मात्र सात दिन का समय है।मुझे श्राप मिला है।उसमें भी आधा समय बीत गया।उक्त बातें कथा के तीसरे दिन शनिवार को अनन्त विभूषित जगद्गुरु रामानुजाचार्य पुष्कर पीठाधीश्वर स्वामी रामचंद्राचार्य जी महाराज ने कहा।उन्होंने कहा कि संत महात्माओं से राजा परीक्षित ने कहा कि हे महात्मा सात दिन में मरने वाला मनुष्य क्या करें कि उसे मोक्ष मिले। आपसभी कुछ उपाय बताए।मेरे लिए मोक्ष के सिवाय कोई उपाय नही है। कोई विकल्प नही है।इस पर ऋषि मुनि विचार करने लगे कि कैसे सात दिन में ही मोक्ष मिले।तब ऋषियों ने श्रीमद्भागवत कथा का महात्म्य से राजा को अवगत कराया।ऋषियों ने कहा कि जबतक राजन भगवान के धाम नही जाएंगे। तब तक ऋषि मुनि यही रहेंगे।श्री त्रिदंडी स्वामी की पुण्यतिथि पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान पुष्कर पीठाधीश्वर ने कहा कि राजा परीक्षित काफी निराश थे। संसार मे जब जीव निराश होता है तो वो उस परिस्थिति से गुजरता है। जिसमे उसे आत्महत्या करने का विचार आने लगता है। जब संसार किसी व्यक्ति को धोखा देता है तो उस व्यक्ति का सारा ध्यान भगवान में लगता है। इस दौरान कथा सुनने को आसपास के लोगो की काफी भीड़ लगी रही।

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