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श्री रामलीला समिति,बक्सर के तत्वावधान में रामलीला मैदान स्थित विशाल मंच पर चल रहे 21 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के दौरान आज ग्यारहवें दिन बुधवार को श्रीधाम वृंदावन से पधारी सुप्रसिद्ध रामलीला मण्डल श्री श्यामा श्याम रासलीला संस्थान के स्वामी श्री नन्दकिशोर रासाचार्य जी के सफल निर्देशन में दिन में कृष्ण लीला के दौरान “सुदामा चरित्र भाग-2″‘ प्रसंग का मंचन किया गया। जिसमें दिखाया गया कि गुरु संदीपन के यहां श्री कृष्ण और सुदामा का विद्या अध्ययन पूर्ण होने पर वह अपने नगर को लौट कर आते हैं । समयानुसार सुदामा जी की वसुंधरा नामक स्त्री से विवाह होता है । दिन पर दिन सुदामा अत्यंत गरीब हो जाते हैं और श्री कृष्णा द्वारकापुरी के राजा हो जाते हैं। बहुत बार पत्नी के हठ करने के पश्चात सुदामा एक दिन अपने बचपन के मित्र श्री कृष्ण के पास मदद मांगने के लिए जाने को तैयार होते हैं। ब्राह्मणी श्री कृष्ण को भेंट में देने के लिए पड़ोस से चावल लेकर आती है। और चावल की पोटली लेकर सुदामा द्वारकापुरी के लिए चल देते हैं। मार्ग में नदी मिलती है जहां श्रीकृष्ण केवट के भेष में उन्हें नदी पार कराते है। चलते चलते रात्रि हो जाती है। काफी थकान होने पर सुदामा एक वृक्ष के नीचे सो जाते हैं तब श्री कृष्ण अपने योग माया से सुदामा को महल के प्रथम द्वार तक पहुंचा देते हैं । प्रभु अपने बचपन के मित्र सुदामा से मिलने महलों से द्वार तक दौड़ कर आते हैं और अपने मित्र का पांव पखारते हैं। सुदामा संकोच वश श्रीकृष्ण से कुछ भी नहीं मांग पाते है। उनके कुछ नहीं मांगने पर भी श्री कृष्ण मुट्ठी भर चावल के बदले दो लोक की संपत्ति प्रदान करते हैं । इस दृश्य को देख दर्शक भावविभोर हो जाते हैं। वहीं देर रात्रि मंचित रामलीला के दौरान “दशरथ मरण, चित्रकूट में श्रीराम व भरत मिलन” प्रसंग का मंचन हुआ। जिसमें मंचन के दौरान दिखाया गया कि जब मंत्री सुमंत प्रभु श्री राम लक्ष्मण व सीता को गंगा के समीप छोड़कर लौटते हैं तो वह काफी दुखी व व्यथित होते हैं। मंत्री सुमंत को दुखित व व्याकुल देखकर निषाद राज उन्हें बहुत समझाते हैं, और उनको सकुशल अयोध्या पहुंचाने के लिए उनके रथ पर अपना सारथी उनके साथ लगा देते हैं मंत्री सुमन्त विलाप करते हुए सायं काल के बाद अयोध्या पहुंचते हैं, और महाराज दशरथ से सारा वृतांत सुनाते हैं । महाराज व्यथित हो जाते हैं और पूर्व में घटित श्रवण कुमार की कथा को रानी कौशल्या से जाकर बताते हैं। श्रीराम की चिंता में महाराजा दशरथ की हालत काफी बिगड़ जाती है और उनका देहांत हो जाता है। राजन के देहांत की खबर सुनकर वशिष्ट जी आते हैं वह एक दूत को भरत जी को बुलाने के लिए उनके ननिहाल भेजते हैं। भरत जी आते हैं और वह राम लक्ष्मण को नहीं देख उनके बारे में पूछते हैं। सारे वृतांत की जानकारी होने पर वह माता कैकई को नाना प्रकार के वचन सुनाते हैं और अपने पिता राजा दशरथ का अंतिम संस्कार करने के उपरांत भरत जी श्री राम को मनाने के लिए चित्रकूट जाने की तैयारी करते हैं। मार्ग में उन्हें निषादराज से भेंट होती है। निषाद राज जी उन्हें लेकर प्रभु श्रीराम जी के पास पहुंचते हैं जहां भगवान श्री राम व भरत जी का भावपूर्ण सुंदर मिलन होता है। भगवान श्रीराम को जब यह पता चलता है कि उनके पिता का देहांत हो गया तो काफी दुखी होते हैं और नदी के किनारे जाकर पिता को श्रद्धांजलि देते हैं। भरत उनको अयोध्या लौटने की बार-बार विनती करते हैं, परंतु श्री राम पिता के वचनों द्वारा वचनबद्ध होने की बात कहकर लौटने से इंकार कर देते हैं। और भरत जी पर कृपा करते हुए अपनी ‘चरण पादुका’ दे देते हैं। भरत जी उस चरण पादुका को लेकर अयोध्या लौटते हैं, और राज सिंहासन में पादुकाओं को स्थापित कर देते हैं । इस मार्मिक दृश्य को देख दर्शक भावविभोर हो जाते हैं और लोगों के आंख से आंसू छलकने लगता है। इसके पूर्व में सायं 4.00 बजे रामलीला मैदान (किला) से भरत जी का रथ निकल कर पूर्व निर्धारित मार्ग क्रमशः रामरेखा घाट मोड़, पीपी रोड़, ठठेरी बाजार मोड़, जमुना चौक, हनुमान फाट, खलासी मुहल्ला, ज्योति चौक, होते हूए स्टेशन रोड स्थित कमलदह सरोवर से भ्रमण करते हुए सीधे मार्ग से रामलीला मंच पहुंचती है, जहाँ सभी लीला मंचित होता है। इस दौरान पुरा रामलीला परिसर श्रद्धालुओं से खचाखच भरा हुआ था। यह और दर्शकों के बीच से रह रह कर जय श्रीराम का उद्घोष होता रहता है।

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