
जीवित्पुत्रिका व्रत 18 सितंबर 2022 दिन रविवार को किया जाएगापुत्र की दीर्घायु एवं कुशलता की कामना से किया जाने वाला जीवित्पुत्रिका का व्रत 18 सितंबर रविवार को किया जाएगा तथा जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण 19 सितंबर सोमवार को प्रातः काल होगा जिनको लंबे समय से संतान नहीं हो रही है उनके लिए जितिया का व्रत एक वरदान की तरह है. संतान की दीर्घायु और सुख समृद्धि की कामना के लिए भी यह व्रत रखा जाता है. इस निर्जला व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहते हैं. इस व्रत में नहाय खाय की परंपरा होती है. कई राज्यों में इसे ‘जिउतिया’ भी कहते हैं. यह व्रत उत्तर प्रदेश समेत बिहार,झारखंड और पश्चिम बंगाल में खूब अच्छे से मनाया जाता है. यह व्रत आसान नहीं होता. इस साल 18 सितंबर को यह व्रत रखा जाएगा. यह व्रत संतान की दीर्घायु और मंगल कामना के लिए रखा जाता है. माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और उसकी रक्षा के लिए निर्जला उपवास रखती हैं. तीन दिन तक चलने वाले इस उपवास में महिलाएं जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करतीं हैं. ऐसी मान्यताएं हैं कि जो लोग संतान की कामना करते हैं उन्हें भी यह व्रत करने से जल्दी संतान प्राप्त होती है. *जीवित्पुत्रिका व्रत का शुभ मुहूर्त* सनातन धर्म के अनुसार जीवित्पुत्रिका का व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को होता है और नवमी तिथि में इसका पारण किया जाता है। इस वार 17 सितंबर को जितिया व्रत की शुरुआत नहाय खाय के साथ किया जाएगा, उसके बाद 18 सितंबर को व्रत रखा जाएगा। प्रोफेसर मुक्तेश्वर नाथ शास्त्री के अनुसार 17 सितंबर को दोपहर 2.56 पर अष्टमी तिथि प्रारंभ होगी और 18 सितंबर शाम 4.39 पर अष्टमी तिथि समाप्त हो जाएगी. और इसका पारण 19 सितंबर को सुबह 6.10 पर सूर्योदय के बाद व्रत का पारण किया जाएगा। *जितिया व्रत की पूजा विधि* व्रत के लिए भोर में उठकर स्नान करना चाहिए और फिर साफ वस्त्र धारण करना चाहिए.इसके बाद व्रत रखने वाली महिलाओं को प्रदोष काल में गाय के गोबर से पूजा स्थल साफ करना चाहिए.व्रत के नियमों के अनुसार,एक छोटा सा तालाब बनाया जाता है और उसके पास एक पाकड़ की डाल खड़ी की जाती है.फिर,शालीवाहन राजा के पुत्र धर्मात्मा जीमूतवाहन की मूर्ति को जल के पात्र में स्थापित किया जाता है. सूर्य को पानी डालने के बाद ही महिलाएं कुछ खाती हैं. *इस के पीछे की कथा* महाभारत युद्ध में पिता की मृत्यु के बाद अश्वत्थामा बहुत क्रोधित था,पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए पांडवों के शिविर गया और उसने पांच लोगों की हत्या कर दी. उसे लगा कि उसने पांडवों को मार दिया लेकिन पांडव जिंदा थे. जब पांडव उसके सामने आए तो उसे पता लगा कि वह द्रौपदी के पांच पुत्रों को मार आया है. यह सब देखकर अर्जुन ने क्रोध में अश्वथामा को बंदी बनाकर दिव्य मणि को छीन लियाअश्वत्थामा ने इस बात का बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रही संतान को मारने की योजना बनाई. उसने गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया,जिससे उत्तरा का गर्भ नष्ट हो गया लेकिन उस बच्चे का जन्म लेना बहुत जरूरी था. इसलिए भगवान कृष्ण ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में ही फिर से जीवित कर दिया. गर्भ में मरकर जीवत होने की वजह से इस तरह उत्तरा के पुत्र का नाम जीवितपुत्रिका पड़ गया और तब से ही संतान की लंबी आयु के लिए जितिया व्रत किया जाने लगा। *जीमूत वाहन देवता की होती है पूजा* अष्टमी तिथि के दिन स्नान करके जीमूत वाहन देवता को पूजा जाता है. उस दिन प्रदोष काल में जीमूत वाहन देवता की भी पूजा होती है. बताया जाता है कि देव को दीप, धूप, अक्षत, रोली, लाल और पीली रूई से सजाया जाता है और फिर उन्हें भोग लगाते हैं.