बक्सर :बलिया की पावन धरती पर 2 तारीख से प्रारंभ हुआ भव्य धार्मिक आयोजन मां भवानी की असीम कृपा तथा अनंत विभूषित आचार्य महामंडलेश्वर 1008 स्वामी आत्म प्रकाश यति महाराज जी के सानिध्य, मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद में अत्यंत दिव्यता, श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ निरंतर निर्बाध रूप से संचालित हो रहा है। महामंडलेश्वर स्वामी श्री सोमेश्वर यति जी महाराज (सिद्ध पीठ हल्द्वानी देहरादून) एवं स्वामी अनंत प्रकाश यति जी महाराज की पुण्य उपस्थिति एवं देशभर से आए गुरु भक्तों, श्रद्धालुओं एवं अनुयायियों की सक्रिय सहभागिता इस आयोजन को और भी अलौकिक बना रही है।
इस महायज्ञ का संचालन विद्वान एवं प्रकांड पंडित मथुरा प्रसाद जी द्वारा वैदिक विधि-विधान के साथ किया जा रहा है, जिसमें अनेक विद्वान पंडितों का सानिध्य प्राप्त हो रहा है। यज्ञशाला में प्रतिदिन प्रातः 6 बजे से सायं तक श्रद्धालुओं द्वारा निरंतर परिक्रमा की जा रही है, जिससे सम्पूर्ण वातावरण भक्तिमय एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत है।
यह आयोजन उजियार घाट की उस पावन परंपरा से भी जुड़ा है, जिसमें गंगा मैया द्वारा महंत को प्रदत ‘कटोरा’ की ऐतिहासिक मान्यता का निर्वहन किया जा रहा है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यहां भव्य निर्माण कार्य भी प्रगति पर है, जो भविष्य में इस स्थल को और अधिक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में स्थापित करेगा।
इस महोत्सव का प्रमुख आकर्षण भगवान श्रीराम की दिव्य कथा है, जिसका रसपान सुप्रसिद्ध कथावाचक आचार्य श्री पौराणिक जी महाराज द्वारा अपनी अमृतमयी वाणी से कराया जा रहा है। उनके द्वारा वर्णित कथा का सार मानव जीवन को गहराई से स्पर्श करता है।
कथा में बताया गया कि रामचरितमानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन के समस्त संबंधों, मूल्यों और व्यवस्थाओं का जीवंत दर्पण है। इसमें दो जीवन पद्धतियों—दैवी और आसुरी—का स्पष्ट वर्णन है।
श्रीराम और भरत दैवी गुणों के प्रतीक हैं,
जबकि रावण और लंका आसुरी प्रवृत्ति के प्रतीक हैं।
कथा के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि जब मनुष्य रावण के मार्ग पर चलता है, तो अंततः दुर्गति, अपयश और विनाश का भागी बनता है। वहीं, जब वह श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में उतारता है, तो अनंतकाल तक यश, कीर्ति और सम्मान प्राप्त करता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस को मानवता के लिए एक सार्वकालिक, दिव्य और अलौकिक वरदान बताते हुए यह भी कहा गया कि इसका वास्तविक उद्देश्य श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में धारण करना है। जब व्यक्ति अपने अंतर्मन में राम के चरित्र को स्थापित कर लेता है, तब वह स्वयं एक चलता-फिरता रामचरितमानस बन जाता है।
यह ग्रंथ दानवता से मानवता, अंधकार से प्रकाश, अन्याय से न्याय, अधर्म से धर्म और मृत्यु से अमृतत्व की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक है। इसका मूल संदेश है—मानवीय एवं दैवी गुणों की स्थापना और आसुरी प्रवृत्तियों का परित्याग।
सम्पूर्ण आयोजन में उमड़ रही श्रद्धालुओं की भीड़ और भक्ति का वातावरण इस बात का प्रमाण है कि यह महायज्ञ और रामकथा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि समाज को दिशा देने वाला एक आध्यात्मिक जागरण भी है।
यह ऐतिहासिक आयोजन बलिया की पावन भूमि को आध्यात्मिक चेतना से आलोकित करते हुए आने वाले समय के लिए एक प्रेरणादायक अध्याय बन रहा है।