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महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय (एम. वी. कॉलेज), बक्सर के मानस सभागार में जंतु विज्ञान एवं वनस्पति विज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘मॉलिक्यूलर बायोलॉजी: एन इंटरडिसिप्लिनरी अप्रोच इन लाइफ साइंसेज’ (Molecular Biology: An Interdisciplinary Approach in Life Sciences) विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य एवं गरिमामय आयोजन किया गया। कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ पधारे हुए मुख्य अतिथि, मुख्य वक्ता, प्राचार्य एवं अन्य गणमान्य अतिथियों द्वारा माँ सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। पूरे कार्यक्रम के दौरान मंच का सफल एवं कुशल संचालन स्नातकोत्तर इतिहास विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. नवीन शंकर पाठक ने किया।

कार्यक्रम के आरंभ में महाविद्यालय के प्राचार्य एवं संरक्षक प्रो. (डॉ.) कृष्णा कांत सिंह ने विश्वविद्यालय से पधारे अतिथियों, विद्वान वक्ताओं, शिक्षकों, शिक्षकेतर कर्मियों एवं छात्र-छात्राओं का स्वागत किया। अपने अध्यक्षीय स्वागत भाषण में उन्होंने कहा कि 21वीं सदी अंतरविषयक (इंटरडिसिप्लिनरी) शोध और उच्च शिक्षा की है। जीवन विज्ञान के विभिन्न अनुशासनों का समन्वय आज मानव कल्याण, कृषि उत्पादकता और असाध्य रोगों के निदान में मील का पत्थर साबित हो रहा है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार महाविद्यालय के विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों में वैज्ञानिक चेतना जागृत करने और आधुनिक आणविक तकनीकों को समझने में अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगी।

वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. नवी रंजन ने विषय की प्रारंभिक रूपरेखा रखते हुए कहा कि आणविक जीव विज्ञान ने पादप एवं जंतु विज्ञान के बीच की पारंपरिक विभाजक रेखाओं को समाप्त कर दिया है। जीन संरचना, ट्रांसक्रिप्शन और जैव प्रौद्योगिकी के नए आयाम पर्यावरण संरक्षण और फसल सुधार के लिए अनिवार्य हो चुके हैं।

इसके उपरांत जंतु विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष एवं एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के संयोजक डॉ. अनुराग कुमार ने विषय प्रवर्तन करते हुए संगोष्ठी के अकादमिक उद्देश्यों को विस्तार से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि मॉलिक्यूलर बायोलॉजी आधुनिक जीवन विज्ञान की रीढ़ है, जो कोशिका के आणविक स्तर पर जीवन की जटिल रासायनिक क्रियाओं को समझने का सशक्त माध्यम है। जेनेटिक्स, इम्यूनोलॉजी, बायोइनफॉरमैटिक्स और मेडिसिन के साथ इसका अंतःसंबंध गंभीर बीमारियों के सटीक निदान, वैक्सीन विकास और लक्षित चिकित्सा (Targeted Therapy) में युगांतरकारी बदलाव ला रहा है।

वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के स्नातकोत्तर वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर (डॉ.) आनंद किशोर ने प्रोजेक्टर प्रस्तुति के माध्यम से विषय पर अत्यंत सारगर्भित और तकनीकी व्याख्यान दिया।

सजीव जगत का साझा मास्टर प्लान: उन्होंने जैव विकास (Evolution) और जैव विविधता से बात शुरू करते हुए कहा कि पृथ्वी पर लाखों ज्ञात प्रजातियों में रूपात्मक (Morphological), शारीरिक और व्यावहारिक भिन्नताएँ होने के बावजूद कोशिकीय और आणविक स्तर पर जीवन का एक साझा “मास्टर प्लान” विद्यमान है।

कोशिका और अणु (Building Blocks): कोशिका जीवन की मूलभूत संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई है। सजीवों का निर्माण अकार्बनिक घटकों (जल, खनिज आयन) और कार्बनिक अणुओं (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, अमीनो एसिड, न्यूक्लिक एसिड एवं लिपिड्स) के सुनियोजित समन्वय से हुआ है।

सेंट्रल डोग्मा (Central Dogma): प्रो. किशोर ने आणविक जीव विज्ञान के मूल सिद्धांत ‘सेंट्रल डोग्मा’ को स्पष्ट करते हुए बताया कि सामान्यतः आनुवंशिक सूचनाओं का प्रवाह एकदिशीय (DNA → RNA → Protein) होता है, जिसमें mRNA, tRNA और rRNA की प्रोटीन संश्लेषण में विशिष्ट भूमिका होती है।

रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन और कैंसर अनुसंधान: उन्होंने रॉस सारकोमा वायरस और ट्यूमर वायरस का संदर्भ देते हुए समझाया कि विशेष परिस्थितियों में ‘रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज़’ (Reverse Transcriptase) एंजाइम की उपस्थिति में RNA से पुनः DNA का निर्माण (रिवर्स सेंट्रल डोग्मा) होता है। उन्होंने रेखांकित किया कि यह आणविक प्रक्रिया कैंसर जीव विज्ञान (Cancer Biology) और ट्यूमर की पहचान व रोकथाम की दिशा में शोधार्थियों के लिए अध्ययन का अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के स्नातकोत्तर जंतु विज्ञान विभाग के प्रोफेसर दीनानाथ पंडित ने विषय पर अत्यंत रोचक, बहुआयामी और व्यावहारिक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि जहाँ हम सोच भी नहीं सकते, मॉलिक्यूलर बायोलॉजी वहाँ मौजूद है-यह विज्ञान की सभी विधाओं को आपस में जोड़ने वाला महासेतु है।

चार आधार स्तंभ: उन्होंने रेप्लिकेशन (Replication), ट्रांसक्रिप्शन (Transcription), ट्रांसलेशन (Translation) और जीन रेगुलेशन (Gene Regulation) को मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के चार मूलभूत स्तंभ बताया।

बायोकैमिस्ट्री और मॉलिक्यूलर बायोलॉजी में अंतर: जहाँ बायोकैमिस्ट्री जैव-अणुओं की संरचना व मेटाबॉलिज्म का अध्ययन करती है, वहीं मॉलिक्यूलर बायोलॉजी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से क्रोमोसोम, डीएनए और आनुवंशिक तंत्र से जुड़े अणुओं पर केंद्रित है।

* हाचिमोजी डीएनए (Hachimoji DNA) एवं एस्ट्रोबायोलॉजी: उन्होंने बताया कि पारंपरिक 4 नाइट्रोजनस बेसों (A, T, G, C) के अतिरिक्त अब 4 नए सिंथेटिक नाइट्रोजनस बेस (P, B, Z, S) विकसित कर लिए गए हैं, जिससे ‘हाचिमोजी डीएनए’ बना है। इसके आधार पर जेनेटिक कोड में कोडॉन्स की संख्या 64 से बढ़कर 4096 तक संभव हो गई है, जो स्पेस बायोलॉजी और अन्य ग्रहों पर जीवन (एलियन लाइफ) को डिकोड करने में क्रांतिकारी सिद्ध होगा।

अन्य विज्ञान अनुशासनों से समन्वय:

भौतिकी: एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी, एनएमआर (NMR), क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी और स्पेक्ट्रोस्कोपी के माध्यम से आणविक संरचना का अध्ययन।

रसायन शास्त्र: डीएनए में क्षारों के बीच हाइड्रोजन बॉन्डिंग (A-T और G-C) तथा एंजाइमेटिक बायोकेमिकल रिएक्शन।

गणित व सांख्यिकी: डीएनए की आणविक माप (34Å, 3.4Å) और मेंडेलियन अनुपातों (9:3:3:1) को सैद्धांतिक रूप से सिद्ध करने में स्टैटिस्टिकल जेनेटिक्स का उपयोग।

कंप्यूटर साइंस और AI: जीनोमिक्स, प्रोटीन फोल्डिंग तथा जटिल बीमारियों के डायग्नोसिस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का महत्व। हालांकि उन्होंने आगाह किया कि एआई पर अंधी निर्भरता घातक हो सकती है।

व्यावहारिक अनुप्रयोग, वैक्सीन और नैतिकता: प्रो. पंडित ने मात्र 6 माह में एम-आरएनए आधारित कोविड वैक्सीन निर्माण, जैव विविधता संरक्षण हेतु पर्यावरण में उपस्थित अवशेषों से ई-डीएनए (eDNA) विश्लेषण, तथा मत्स्य पालन में अधिक वृद्धि दर वाली ‘जयंती रोहू’ व ‘अमृत कतला’ मछली के विकास पर चर्चा की। मानवीय पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि यदि प्रयोगशाला में 25 वैज्ञानिक मिलकर काम कर सकते हैं, तो हमें घरों में एकाकी होने से बचना चाहिए। साथ ही उन्होंने विवाह पूर्व गंभीर आनुवंशिक बीमारियों की पहचान हेतु जेनेटिक प्रोफाइलिंग कराने पर विशेष बल दिया।

मुख्य अतिथि वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के पूर्व कुलपति प्रो. (डॉ.) एन. के. साह ने मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, जेनेटिक इंजीनियरिंग और बायोटेक्नोलॉजी के इतिहास और विकास यात्रा पर अत्यंत विस्तृत व ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिया।

विद्या की वैदिक अवधारणा: उन्होंने ‘सा विद्या या विमुक्तये’ का उल्लेख करते हुए कहा कि सच्ची विद्या वही है जो संकीर्णताओं और अज्ञानता से मुक्त करे। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण (1893), रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के प्रेरक विचारों का स्मरण कराते हुए विद्यार्थियों को राष्ट्र निर्माण हेतु ज्ञानार्जन का आह्वान किया।

* डीएनए डबल हेलिक्स मॉडल का इतिहास: प्रो. साह ने बताया कि 1953 में वाटसन और क्रिक द्वारा प्रस्तुत डीएनए डबल हेलिक्स मॉडल के पीछे भौतिक विज्ञानी मौरिस विल्किंस और रोजालिंड फ्रैंकलिन की एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी तकनीक का ऐतिहासिक योगदान था, जिसके आधार पर उन्हें 1962 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।

* जेनेटिक इंजीनियरिंग एवं कृषि क्रांति: उन्होंने रेस्ट्रिक्शन एंजाइम (Restriction Enzymes) की खोज को आधुनिक आनुवंशिक अभियांत्रिकी (RDT) की आधारशिला बताया। प्रो. साह ने भारत में हरित क्रांति के जनक प्रो. एम. एस. स्वामीनाथन के योगदान को याद करते हुए खाद्य सुरक्षा में आए आमूलचूल बदलावों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि जेनेटिक इंजीनियरिंग द्वारा आज विटामिन-ए से भरपूर ‘गोल्डन राइस’, 15-20 दिनों तक जलजमाव सहने वाला ‘सुबी-1 राइस’ (Sub1 Gene), कीट-रोधी ‘बीटी-कॉटन’ और ‘बीटी-बैंगन’ विकसित किए गए हैं। साथ ही उन्होंने बिना सीजन सालों भर उपलब्ध होने वाले लाल टमाटरों में ‘पॉलीगैलेक्ट्यूरोनेज’ (PG) जीन को एंटीसेंस तकनीक से साइलेंस करने के वैज्ञानिक तंत्र को समझाया।

* एपोप्टोसिस (Apoptosis) एवं पारंपरिक चिकित्सा: प्रो. साह ने प्रोग्राम्ड सेल डेथ ‘एपोप्टोसिस’ को समझाते हुए बताया कि जब यह प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित होती है तो ट्यूमर और कैंसर जैसी बीमारियाँ जन्म लेती हैं, जबकि इसकी अधिकता से अल्जाइमर और आर्थराइटिस होता है। उन्होंने वैज्ञानिक प्रमाण रखते हुए स्पष्ट किया कि हल्दी में पाया जाने वाला ‘करक्यूमिन’ और कनेर की पत्तियों से प्राप्त ‘ओलियंडरिन’ न्यूक्लियर फैक्टर कप्पा-बी (NF-κB) को नियंत्रित कर सूजन और कैंसर से बचाव में संजीवनी की तरह कार्य करते हैं।

पुस्तक विमोचन एवं प्राचार्य का उद्बोधन:

सत्र के समापन चरण में मंचस्थ अतिथियों द्वारा महाविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. नवी रंजन द्वारा लिखित दो पुस्तकों का विधिवत विमोचन किया गया। पुस्तक विमोचन के उपरांत प्राचार्य प्रो. (डॉ.) कृष्णा कांत सिंह ने बधाई देते हुए कहा कि उनके महाविद्यालय में योगदान के बाद यह किसी प्राध्यापक के पुस्तक विमोचन का पहला ऐतिहासिक अवसर है। उन्होंने कहा कि देश-दुनिया में ख्याति प्राप्त ऐसे मूर्धन्य वैज्ञानिकों और विद्वानों को महाविद्यालय परिसर में प्रत्यक्ष सुनना पूरे संस्थान के लिए परम सौभाग्य की बात है। कार्यक्रम के अंत में स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. पंकज कुमार चौधरी ने पधारे हुए मुख्य अतिथि, मुख्य वक्ता, प्राचार्य, महाविद्यालय के सभी शिक्षक साथियों, शिक्षकेतर कर्मचारियों, छात्र-छात्राओं एवं मीडिया प्रतिनिधियों के प्रति औपचारिक धन्यवाद ज्ञापित किया। अंत में सामूहिक राष्ट्रगान एवं अल्पाहार के साथ राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफलतापूर्वक समापन हुआ।

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