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भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए संगठित जनांदोलन और राजनीतिक इच्छाशक्ति अनिवार्य : सांसद सुधाकर सिंह

40 करोड़ जनमानस की भाषा को संवैधानिक अधिकार दिलाने हेतु दलीय सीमाओं से परे एकजुट होना होगा : विधायक ओमप्रकाश सिंह

पाणिनीय ‘अष्टाध्यायी’ की ‘कारूषी’ और समृद्ध ऐतिहासिक-सांस्कृतिक परंपरा से युक्त है भोजपुरी : प्रो. दिवाकर पाण्डेय

औपनिवेशिक मानसिकता त्यागकर मातृभाषा के गौरव और ज्ञान-सृजन से जुड़ने की आवश्यकता : प्रो. कृष्णा कांत सिंह

निबंध प्रतियोगिता के विभिन्न विभागों के 47 मेधावियों को सांसद के कर-कमलों से मिला पदक व प्रशस्ति-पत्

बक्सर। शब्दन फाउन्डेशन एवं महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय, बक्सर के संयुक्त तत्त्वावधान में महाविद्यालय के मानस सभागार में ‘संवाद श्रृंखला’ के अंतर्गत ‘भोजपुरी में संवैधानिक अधिकार’ विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय विचार-संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ अतिथियों द्वारा महर्षि महामुनि की प्रतिमा पर पुष्पांजलि, दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में बक्सर के माननीय सांसद श्री सुधाकर सिंह, मुख्य वक्ता के रूप में पूर्व मंत्री सह वर्तमान विधायक श्री ओमप्रकाश सिंह, विषय प्रवर्तक के रूप में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. दिवाकर पाण्डेय तथा अध्यक्ष के रूप में महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. कृष्णा कांत सिंह उपस्थित रहे। मंच का कुशल संचालन शब्दन फाउंडेशन के संयोजक श्री शिवेंद्र सिंह राणा ने किया।

भाषा के अस्तित्व के लिए जनांदोलन और विधायी दबाव आवश्यक : सांसद सुधाकर सिंह

मुख्य अतिथि बक्सर सांसद श्री सुधाकर सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि आधुनिक विश्व में किसी भी समाज की अस्मिता, ज्ञान-परंपरा और अस्तित्व का सबसे बड़ा आधार उसकी भाषा होती है। उन्होंने कहा कि यदि यूरोप और अमेरिका का वैश्विक वर्चस्व है, तो उसके पीछे उनकी भाषाई ताकत है। भारत में भी सैकड़ों जनजातियाँ केवल इसलिए विलुप्त हो गईं क्योंकि उनकी भाषा का संरक्षण नहीं हो सका।

सांसद ने स्पष्ट किया कि संख्या बल और वैश्विक प्रभाव के आधार पर भोजपुरी भारत की सर्वाधिक समृद्ध भाषाओं में से एक है। यह मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद, फिजी और गुयाना सहित विश्व के 15 से अधिक देशों में बोली जाती है। इसके बावजूद यदि यह संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं हो पाई है, तो इसका सबसे बड़ा कारण भाषाई समाज का संगठित और आंदोलनात्मक रूप से मुखर न होना है। उन्होंने दक्षिण भारत के भाषा आंदोलनों और पूर्ववर्ती छात्र आंदोलनों का दृष्टांत देते हुए कहा कि संसद में दिए गए आश्वासनों को अमलीजामा पहनाने के लिए सड़क पर मजबूत वैधानिक और जनवादी दबाव बनाना होगा।

उन्होंने बक्सर की पावन तपोभूमि का स्मरण करते हुए कहा कि यह केवल कर्मभूमि ही नहीं, बल्कि महर्षि विश्वामित्र और भगवान श्रीराम की वास्तविक ज्ञानभूमि है। उन्होंने विश्वास दिलाया कि वे अपने संसदीय कौशल और बौद्धिक सामर्थ्य से बक्सर के ऐतिहासिक गौरव को पुनर्स्थापित करेंगे और संसद के पटल पर भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग को पुरजोर तरीके से उठाएंगे।

सत्ता सेवा का साधन है, राजनीतिक संकल्प से ही संभव है अधिकार : विधायक ओमप्रकाश सिंह

मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित माननीय विधायक एवं पूर्व मंत्री श्री ओमप्रकाश सिंह ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि राजनीति कोई व्यवसाय नहीं, बल्कि निस्वार्थ समाज-सेवा और सिद्धांतों का संघर्ष है। उन्होंने महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी के युगांतरकारी संघर्षों का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने किस प्रकार भिक्षाटन कर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जैसी वैश्विक ज्ञान-संस्था का निर्माण किया।

श्री सिंह ने कहा कि 40 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भोजपुरी भाषा को आज भी संवैधानिक स्वत्व न मिलना चिंतनीय है। उन्होंने बक्सर की सांस्कृतिक व ऋषि-परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारी माटी में अद्भुत सामर्थ्य है। यदि सत्ता पर काबिज लोग भाषा के सवाल पर दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर एकमत नहीं होंगे, तब तक यह लड़ाई अधूरी रहेगी। उन्होंने युवा पीढ़ी और विशेष रूप से छात्राओं का आह्वान करते हुए कहा कि वे समाज-निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाएँ और अपनी सांस्कृतिक पहचान व भाषा को बचाने के लिए आगे आएँ।

पाणिनीय ‘अष्टाध्यायी’ और सिद्ध-साहित्य से प्रमाणित है भोजपुरी की प्राचीनता : प्रो. दिवाकर पाण्डेय

विषय प्रवर्तन करते हुए मूर्धन्य भाषाविद् प्रो. दिवाकर पाण्डेय ने अकादमिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ भोजपुरी की सुदीर्घ परंपरा को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के मतानुसार साहित्य की अनुपलब्धता भाषा के अस्तित्व को नकार नहीं सकती। भोजपुरी का उद्भव अत्यंत प्राचीन है, जिसका उल्लेख पाणिनीय ‘अष्टाध्यायी’ में ‘कारूषी’ भाषा के रूप में मिलता है, जो पौराणिक ‘करुष देश’ (गंगा, सोन, कर्मनाशा और कैमूर की पहाड़ियों से घिरे क्षेत्र) की भाषा रही है।

उन्होंने जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन के भाषा सर्वेक्षण के हवाले से कहा कि भोजपुरी वाचिक और लोक परंपरा की दृष्टि से विश्व की सर्वाधिक उर्वर भाषाओं में से एक है। सिद्ध-नाथ परंपरा (गोरखनाथ, भर्तृहरि, गोपीचंद) से लेकर संत कबीर तक भोजपुरी की साहित्यिक निरंतरता अक्षुण्ण रही है। उन्होंने आरटीआई के तथ्यों का हवाला देते हुए कहा कि जब संविधान में भाषा शामिल करने का कोई स्पष्ट पैमाना नहीं है और कम जनसंख्या वाली भाषाएँ आठवीं अनुसूची में जा सकती हैं, तो 20 करोड़ से अधिक की वैश्विक आबादी वाली भोजपुरी को वंचित रखना सर्वथा अन्यायपूर्ण है।

मातृभाषा के प्रति संकोच छोड़ें, ज्ञान-सृजन से ही बनेगी वैश्विक पहचान : प्राचार्य प्रो. कृष्णा कांत सिंह

अध्यक्षीय संबोधन में महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. कृष्णा कांत सिंह ने भोजपुरी में संवाद स्थापित करते हुए कहा कि जिस माटी से हम जन्म लेते हैं, उसके प्रति हमारा गहरा दायित्व होता है। उन्होंने आम जनजीवन में भोजपुरी बोलने में आने वाले हिचक और संकोच की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की और कहा कि गैर-हिंदी भाषियों ने भी हिंदी और जनभाषाओं के उत्थान में बड़ा योगदान दिया है।

प्रो. सिंह ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक विस्तार के ‘3T’ सिद्धांत—टेक्स्टबुक (Textbook), ट्रेड (Trade) और थेफ्ट (Theft) का विश्लेषण करते हुए कहा कि जब तक किसी भाषा का अनुवाद, पाठ्य-पुस्तकों और उच्च अकादमिक अनुसंधानों में प्रयोग नहीं होगा, तब तक उसका पूर्ण विकास संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि भिखारी ठाकुर के केवल उत्सव तक सीमित न रहकर गंभीर ज्ञान-भाषा के रूप में भोजपुरी का विस्तार होना चाहिए। उन्होंने आश्वस्त किया कि बक्सर की इस धरती से शुरू हुआ यह वैचारिक आंदोलन अब थमने वाला नहीं है।

प्रतिभा सम्मान समारोह : निबंध प्रतियोगिता के उत्कृष्ट छात्र-छात्राएँ पुरस्कृत

कार्यक्रम के अंतिम चरण में आयोजित प्रतिभा सम्मान समारोह में महाविद्यालय के विभिन्न विभागों द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले कुल 47 छात्र-छात्राओं को मुख्य अतिथि सांसद श्री सुधाकर सिंह एवं मंचासीन अतिथियों द्वारा मेडल व प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

सम्मानित विद्यार्थियों की विभागवार सूची :

* इतिहास (History): अनु कुमारी (प्रथम), रक्षा कुमारी (द्वितीय), खुशबू कुमारी (द्वितीय), संजना कुमारी (तृतीय), अमृता कुमारी (तृतीय)

* अर्थशास्त्र (Economics): श्रेया सिंह (प्रथम), ईशू कुमारी (द्वितीय), काजल कुमारी (तृतीय)

* राजनीति विज्ञान (Pol. Science): संध्या कुमारी (प्रथम), श्रेया सिंह (द्वितीय), तान्या सिंह (तृतीय)

* मनोविज्ञान (Psychology): अनुष्का कुमारी (प्रथम), भारती कुमारी (द्वितीय), कुमारी आरती (तृतीय)

* अंग्रेजी (English): अंजलि कुमारी (प्रथम), अंजलि दुबे (द्वितीय), अक्षिता श्रीवास्तव (द्वितीय), रिया कुमारी (तृतीय)

* वनस्पति विज्ञान (Botany): सानिया हुसैन (प्रथम), श्रेया कुमारी (द्वितीय), दीक्षा (तृतीय)

* रसायन विज्ञान (Chemistry): सृष्टि कुमारी (प्रथम), प्रेम सागर (द्वितीय), शिवराज सिंह (द्वितीय), अंजलि कुमारी (तृतीय), मनीषा कुमारी (तृतीय)

* जंतु विज्ञान (Zoology): समरीन (प्रथम), चन्दन कुमार (द्वितीय), पायल कुमारी (द्वितीय), प्रिया सिंह (तृतीय), रानी कुमारी (तृतीय)

* भौतिकी (Physics): आदित्य कुमार वर्मा (प्रथम), विमलेश कुमार (द्वितीय), रिंकी कुमारी (तृतीय)

* दर्शनशास्त्र (Philosophy): प्रियंशु शुभम (प्रथम), आशा कुमारी भारती (द्वितीय), जैसमीन खातून (तृतीय)

* संस्कृत (Sanskrit): आशा कुमारी भारती (प्रथम), तारा कुमारी (द्वितीय), सलोनी कुमारी (तृतीय), प्रिया कुमारी (तृतीय)

* हिंदी (Hindi): सोनम कुमारी (प्रथम), तनीषा कुमारी (द्वितीय), खुशी कुमारी (तृतीय)

* गणित (Mathematics): शुभम कुमार (प्रथम), सृष्टि राज (द्वितीय), शिवमुन्नी कुमार (तृतीय)

समारोह के अंत में महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. पंकज कुमार चौधरी ने समस्त मंचासीन अतिथियों, वक्ताओं, महाविद्यालय परिवार, मीडिया कर्मियों एवं सभागार में उपस्थित प्रबुद्ध श्रोताओं के प्रति औपचारिक धन्यवाद ज्ञापित किया। संगोष्ठी का समापन राष्ट्रगान के सामूहिक गान के साथ हुआ। इस अवसर पर महाविद्यालय के समस्त प्राध्यापक, शिक्षकेतर कर्मचारी, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।

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